Calcutta High Court: पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनावी सरगर्मी के बीच कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य के अति संवेदनशील मतदान केंद्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पूरी तरह से चुनाव आयोग का अधिकार क्षेत्र है। हाई कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) द्वारा दायर उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें चुनाव आयोग द्वारा संवेदनशील बूथों पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की तैनाती के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब बंगाल के विवादित और संवेदनशील इलाकों में स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान का रास्ता साफ हो गया है।
Calcutta High Court: क्या है पूरा मामला और आयोग का निर्देश
यह विवाद तब शुरू हुआ जब 18 अप्रैल 2026 को चुनाव आयोग ने एक आधिकारिक निर्देश जारी किया। आयोग ने अपनी विभिन्न खुफिया रिपोर्टों और स्थानीय सूचनाओं के आधार पर राज्य के कई बूथों को ‘अति संवेदनशील’ (Highly Sensitive) श्रेणी में रखा था। इन बूथों पर मतदाताओं के मन से डर निकालने और हिंसा की किसी भी आशंका को रोकने के लिए आयोग ने केंद्रीय बलों की तैनाती का निर्णय लिया। आयोग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि हर मतदाता बिना किसी दबाव या भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके। हालांकि, राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए इसे अदालत में चुनौती दी थी।
अदालत में TMC के वकीलों की दलीलें

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान तृणमूल कांग्रेस की ओर से वकील अनिर्वाण राय ने मोर्चा संभाला। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव आयोग ने केंद्रीय बलों की तैनाती के मामले में तय नियमों यानी ‘मैनुअल ऑन फोर्स डिप्लॉयमेंट’ का सही तरीके से पालन नहीं किया है। टीएमसी का मुख्य तर्क यह था कि किसी भी क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने और वहां बलों की मैपिंग करने की प्रक्रिया चुनाव से कम से कम छह महीने पहले शुरू हो जानी चाहिए। वकील ने आरोप लगाया कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के ठीक बाद इस तरह का निर्देश जारी करना ‘उद्देश्यपूर्ण’ लगता है और यह कहीं न कहीं राज्य की कानून-व्यवस्था की छवि को प्रभावित करने की कोशिश है।
Calcutta High Court: चुनाव आयोग ने संविधान के हवाले से दिया जवाब
वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग की तरफ से वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्रि नायडू ने पुरजोर तरीके से पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 329(बी) के तहत एक बार चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार सीमित होता है। आयोग ने दलील दी कि 2023 के नए मैनुअल की धारा 1.3 के तहत आयोग के पास यह अधिकार है कि वह कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए और भयमुक्त वातावरण बनाने के लिए उचित कदम उठा सके। आयोग ने साफ किया कि केंद्रीय बलों की तैनाती का फैसला किसी राजनीतिक मंशा से नहीं बल्कि खुफिया इनपुट्स और जमीनी हकीकत के आधार पर लिया गया है।
Calcutta High Court: कलकत्ता हाई कोर्ट का कड़ा रुख और फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग के कदम को जायज ठहराया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आयोग का निर्णय तथ्यों और ठोस खुफिया रिपोर्टों पर आधारित है, इसलिए इसमें किसी भी तरह की अवैधता नहीं पाई गई है। न्यायाधीश ने इस बात को भी रेखांकित किया कि संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और मैपिंग का काम अचानक नहीं हुआ है, बल्कि जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारी लगातार स्थिति की समीक्षा कर रहे थे और वे जमीनी हालात से पूरी तरह वाकिफ थे। कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसमें बाधा नहीं डाली जानी चाहिए।
स्वतंत्र मतदान की दिशा में एक बड़ा कदम
अदालत के इस फैसले को बंगाल चुनाव के मद्देनजर एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी दलों का लंबे समय से आरोप रहा है कि कुछ इलाकों में स्थानीय प्रशासन के प्रभाव के कारण निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हो पाते। ऐसे में केंद्रीय बलों की मौजूदगी से मतदाताओं का भरोसा बढ़ने की उम्मीद है। चुनाव आयोग अब हाई कोर्ट के इस निर्देश के बाद अपनी कार्ययोजना को और मजबूती से लागू कर सकेगा। 2026 के इस चुनावी माहौल में सुरक्षा बलों की तैनाती अब सुचारू रूप से जारी रहेगी, जिससे राज्य में शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बढ़ावा मिलेगा।
Calcutta High Court: राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बाजार गर्म
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। जहां भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र की जीत बताया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि यह फैसला राज्य पुलिस की क्षमता पर अविश्वास जैसा है। हालांकि, कानूनी जानकारों का कहना है कि चुनाव के दौरान सुरक्षा संबंधी फैसलों में आयोग की सर्वोच्चता हमेशा बरकरार रहती है। अब सबकी नजरें आने वाले मतदान के चरणों पर टिकी हैं कि केंद्रीय बलों की यह तैनाती चुनावी नतीजों और मतदान के प्रतिशत को किस तरह प्रभावित करती है।
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