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Flood Fury in Odisha: महानदी की बाढ़ ने ओडिशा के किसान बल्लभ की मेहनत को बहाया, 2.5 लाख की फसल बर्बाद; एक साल पहले बेटी-भतीजी छीन चुकी थी नदी

Flood Fury in Odisha: ओडिशा में महानदी की हालिया बाढ़ ने एक बार फिर किसानों की मेहनत को पानी में मिला दिया है। बांकी-दमपाड़ा ब्लॉक के कैनमुंडी गांव के किसान बल्लभ बेहेरा की 60 गुंठ जमीन पर लगी सब्जियों की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है। करीब तीन महीने की मेहनत और ढाई लाख रुपये के निवेश के बाद फसल कटाई के करीब पहुंच चुकी थी। लेकिन अचानक बढ़े पानी ने सब कुछ बहा दिया। एक साल पहले इसी महानदी ने बल्लभ की बेटी और भतीजी को छीन लिया था। अब वही नदी उनकी आजीविका भी छीन चुकी है।

Flood Fury in Odisha: बाढ़ ने तीन महीने की मेहनत को पल भर में मिटाया

बल्लभ बेहेरा पिछले 26 साल से सब्जी की खेती कर रहे हैं। 42 वर्षीय यह किसान बांकी-दमपाड़ा क्षेत्र में सफल किसान के रूप में पहचाने जाते थे। परिवार की चार एकड़ जमीन में से 60 गुंठ जमीन पर उन्होंने इस बार सब्जियां लगाई थीं। यह जमीन कटक-बांकी मुख्य सड़क के किनारे स्थित है।

उन्होंने पांच गुंठ पर कुंदुरू, 15 गुंठ पर परवल, 10 गुंठ पर खीरा, 10 गुंठ पर पपीता, 10 गुंठ पर बैंगन और बाकी जमीन पर अन्य सब्जियां उगाई थीं। तीन महीने की लगातार देखभाल के बाद फसल कटाई के चरण में पहुंच गई थी। महज पांच दिन पहले उन्होंने 40 किलो खीरा तोड़ा था और कटक के छत्रा बाजार में और सब्जी भेजने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन महानदी का पानी अचानक बढ़ गया और पूरा खेत छाती तक पानी में डूब गया। ज्यादातर पौधे और सब्जियां बह गईं।

खेत के किनारे बैठे किसान, घर लौटने से इनकार

नुकसान इतना गहरा है कि बल्लभ पिछले दो दिनों से अपने डूबे हुए खेत के किनारे ही बैठे हुए हैं। घर लौटने से साफ इनकार कर दिया है। पिता और भाई खेत पर पहुंचकर उन्हें मनाने की कोशिश करते रहे, लेकिन टूटे हुए किसान फसल के अवशेष छोड़कर घर नहीं लौट पा रहे। उन्होंने करीब ढाई लाख रुपये की लागत लगाई थी और करीब पांच लाख रुपये की आमदनी की उम्मीद लगाई थी। अब सब कुछ पानी में बह चुका है।

कैनमुंडी गांव उन क्षेत्रों में शामिल है जो महानदी में पानी बढ़ने पर सबसे पहले प्रभावित होते हैं। बांकी क्षेत्र में जब भी नदी उफान पर होती है, यह गांव बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इस बार भी वही हुआ। बल्लभ के खेत अब छाती भर पानी में डूबे पड़े हैं। हरी-भरी फसल की जगह अब सिर्फ पानी और मिट्टी का जमावड़ा दिख रहा है।

एक साल पहले भी महानदी ने परिवार को तोड़ा था

इस आपदा ने बल्लभ के परिवार के पुराने जख्म फिर से हरे कर दिए हैं। पिछले साल जून में परिवार के सदस्य नदी पार करके नहाने गए थे। रास्ते में नाव पलट गई। गांव वालों ने कई लोगों को बचा लिया, लेकिन बल्लभ की भतीजी जिग्यासा बेहेरा आठ घंटे बाद मृत मिलीं। उनकी 12 वर्षीय बेटी भी बचाए गए लोगों में शामिल थी, लेकिन कुछ दिनों बाद उसकी भी मौत हो गई।

बेटी और भतीजी को खोने के बाद बल्लभ अब कहते हैं कि महानदी ने उनकी आजीविका भी छीन ली है। वे गहरी पीड़ा के साथ बोले, “हम महानदी के किनारे बड़े हुए और इसी जमीन पर खेती करके जिंदा रहे। लेकिन किस्मत के क्रूर मजाक ने उस नदी को हमारा सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया जो कभी हमारी जीवन रेखा थी।”

सफल किसान की पहचान और अब बर्बादी

बल्लभ बेहेरा बांकी-दमपाड़ा क्षेत्र में सफल सब्जी उत्पादक के रूप में जाने जाते थे। 26 साल की अनुभव के साथ उन्होंने खेती को परिवार की मुख्य आय का स्रोत बनाया था। इस बार भी उन्होंने मेहनत से फसल तैयार की थी। बाजार में अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद थी। लेकिन बाढ़ ने सारी योजनाएं ध्वस्त कर दीं। खेत सड़क के किनारे होने के कारण परिवहन आसान था, लेकिन नदी के करीब होने का खतरा हमेशा बना रहता था।

बाढ़ आने के बाद खेत में छाती तक पानी भर गया। पौधे उखड़ गए, फल सड़ने लगे और मिट्टी बह गई। तीन महीने की मेहनत, खाद-बीज और मजदूरी का खर्च सब बेकार हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही बेटी-भतीजी की मौत के बाद दबाव में थी। अब फसल के नुकसान ने हालात और बिगाड़ दिए हैं।

महानदी की बाढ़ और क्षेत्र की समस्या

महानदी ओडिशा की प्रमुख नदी है। मानसून में इसके जल स्तर में अचानक बढ़ोतरी आम बात है। बांकी-दमपाड़ा ब्लॉक के कई गांव नदी के किनारे बसे हैं। पानी बढ़ते ही खेत और घर प्रभावित होते हैं। कैनमुंडी गांव हर बार पहले प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में शामिल रहता है। इस बार भी पानी ने सब्जी की फसल को निशाना बनाया।

किसान लंबे समय से सुरक्षात्मक उपायों की मांग करते रहे हैं। तटबंध मजबूत करने, जल निकासी की बेहतर व्यवस्था और फसल बीमा की पहुंच बढ़ाने की जरूरत बताई जाती रही है। बल्लभ जैसे छोटे और मझोले किसान बाढ़ के बार-बार होने वाले नुकसान से जूझते रहते हैं। एक बार फसल बर्बाद होने पर दोबारा निवेश जुटाना मुश्किल हो जाता है।

परिवार की पीड़ा और भविष्य की चिंता

बल्लभ के परिवार के लिए यह दोहरी त्रासदी है। एक साल पहले नदी ने परिवार के दो सदस्यों को छीन लिया। अब वही नदी आजीविका का स्रोत भी नष्ट कर चुकी है। खेत के किनारे बैठे किसान की हालत देखकर परिवार वाले बेचैन हैं। वे उन्हें घर ले जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन बल्लभ फसल के अवशेष छोड़ने को तैयार नहीं।

आर्थिक नुकसान के साथ भावनात्मक आघात भी गहरा है। 26 साल की खेती का अनुभव अब एक बड़े झटके के सामने कमजोर पड़ गया है। ढाई लाख का निवेश डूबने और पांच लाख की उम्मीद टूटने से परिवार पर भारी बोझ पड़ा है। आने वाले दिनों में दोबारा खेती शुरू करने के लिए पूंजी जुटाना चुनौती भरा होगा।

क्षेत्र में बाढ़ का असर और राहत की जरूरत

बांकी क्षेत्र में महानदी की बाढ़ ने कई किसानों को प्रभावित किया है। बल्लभ का मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने लंबे समय से सफल खेती की मिसाल कायम रखी थी। अब वही किसान टूटा हुआ खेत के किनारे बैठा है। प्रशासन की ओर से राहत और मुआवजे की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है, लेकिन नुकसान की भरपाई पूरी तरह संभव नहीं दिखती।

किसानों का कहना है कि बार-बार बाढ़ आने से खेती जोखिम भरी हो गई है। नदी के किनारे की उपजाऊ जमीन अच्छी पैदावार देती है, लेकिन बाढ़ का खतरा हमेशा बना रहता है। बल्लभ जैसे किसानों के लिए वैकल्पिक आय के स्रोत और फसल बीमा की बेहतर कवरेज जरूरी है।

महानदी की इस बाढ़ ने ओडिशा के किसान बल्लभ बेहेरा की तीन महीने की मेहनत और ढाई लाख रुपये के निवेश को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। 60 गुंठ सब्जी की फसल छाती तक पानी में डूब गई। एक साल पहले इसी नदी ने उनकी बेटी और भतीजी को छीन लिया था। अब आजीविका भी चली गई। टूटा हुआ किसान पिछले दो दिनों से खेत के किनारे बैठा है। परिवार उसे घर लौटाने की कोशिश कर रहा है। बांकी-दमपाड़ा क्षेत्र के इस सफल किसान की कहानी बाढ़ की क्रूरता और किनारे बसे किसानों की मजबूरी दोनों को दर्शाती है। राहत और लंबे समय के उपाय दोनों की जरूरत है ताकि ऐसी तबाही दोबारा न दोहराई जाए।
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Netsha Singh
Author: Netsha Singh

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