India US Trade: अमेरिकी व्यापारिक गलियारों से भारत के लिए एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आई है। अमेरिका ने भारत समेत दुनिया भर के करीब साठ देशों पर दस प्रतिशत का नया आयात शुल्क यानी टैरिफ थोप दिया है। यह कड़ा कदम अमेरिकी प्रशासन द्वारा सेक्शन 301 के अंतर्गत कई महीनों तक चली गहन जांच के बाद उठाया गया है।
शुरुआत में भारतीय सामानों पर साढ़े बारह प्रतिशत तक शुल्क लगाने के कयास लगाए जा रहे थे, जिसे बाद में घटाकर दस प्रतिशत कर दिया गया। इस फेहरिस्त में भारत के साथ-साथ पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका के अलावा कई अन्य एशियाई और लैटिन अमेरिकी देश भी शामिल किए गए हैं। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इन देशों ने अपने यहां जबरन मजदूरी यानी फोर्स्ड लेबर के चलन को रोकने के लिए पर्याप्त और पुख्ता कदम नहीं उठाए हैं, जिसके चलते यह दंडात्मक कार्रवाई की गई है।
India US Trade: क्या है सेक्शन 301 और क्यों हुई यह कार्रवाई?
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमीसन ग्रीर के मुताबिक इस पूरी कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य मानवाधिकारों की रक्षा करना और वैश्विक व्यापार में निष्पक्षता को बढ़ावा देना है। अमेरिकी ट्रेड एक्ट 1974 का सेक्शन 301 वह कानूनी प्रावधान है, जो अमेरिका को किसी भी देश के खिलाफ व्यापारिक प्रतिबंध या शुल्क लगाने की ताकत देता है यदि उस पर अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यापारिक तौर-तरीकों का आरोप हो।
मौजूदा ट्रंप प्रशासन ने इसी साल मार्च के महीने में दो अलग-अलग मामलों पर भारत के खिलाफ जांच शुरू की थी। इनमें से एक मामला जबरन मजदूरी से जुड़ा था और दूसरा अतिरिक्त मैन्युफैक्चरिंग क्षमता से संबंधित था। जबरन मजदूरी की जांच तो अब अपने अंजाम तक पहुंच चुकी है और इसी के तहत नया टैरिफ लागू किया गया है, जबकि अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को लेकर जांच अभी भी ठंडे बस्ते में नहीं गई है बल्कि उस पर प्रक्रिया जारी है।
भारत का पक्ष और व्यापार समझौते की पेचीदगियां
जब अमेरिका में इस पूरे मामले पर जांच चल रही थी, उस दौरान भारतीय हुकूमत और देश के प्रमुख उद्योग संगठनों ने अपना पक्ष मजबूती से रखा था। उनका साफ कहना था कि भारत के संविधान और श्रम कानूनों में जबरन मजदूरी के खिलाफ पहले से ही कड़े प्रावधान मौजूद हैं। इस बीच, एक तरफ जहां यह नया टैरिफ लागू हुआ है, वहीं दूसरी तरफ भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भी समानांतर रूप से चल रही है।
इसी साल फरवरी के महीने में दोनों देशों के नुमाइंदों ने एक साझा मसौदे पर सहमति जताई थी। उस वक्त यह उम्मीद बंधी थी कि भारतीय उत्पादों पर लगने वाले भारी-भरकम कुल टैरिफ को पचास प्रतिशत से घटाकर अठारह प्रतिशत तक लाया जा सकता है। इसके एवज में भारत की तरफ से यह पेशकश की गई थी कि वह आगामी पांच वर्षों के भीतर अमेरिका से पांच सौ अरब डॉलर के उत्पादों की खरीद करेगा और अमेरिकी कंपनियों को अपने बाजार में अधिक हिस्सेदारी देगा।
India US Trade: निर्यातकों की बढ़ी धड़कनें और प्रतिस्पर्धी देशों का पेंच
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कुछ समय पहले यह उम्मीद जताई थी कि अगर अठारह प्रतिशत वाला ढांचा लागू होता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय सामानों को एक मजबूत प्रतिस्पर्धी बढ़त मिलेगी। हालांकि, हालात तब थोड़े पेचीदा हो गए जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के वैश्विक रेसिप्रोकल टैरिफ को खारिज कर दिया, जिससे पूरी प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे।
भारतीय नीति निर्धारकों और व्यापार जगत के लिए सबसे बड़ी चिंता का सबब यह है कि भारत के खिलाफ सेक्शन 301 के तहत दो मोर्चों पर जांच बैठी थी। इसके विपरीत, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे हमारे कई करीबी प्रतिस्पर्धी देशों के खिलाफ केवल जबरन मजदूरी वाला एक ही मामला चल रहा है।
वैश्विक व्यापार मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ मार्क लिंस्कॉट का इस पूरी स्थिति पर मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते की बुनियादी शर्तों पर लगभग सहमति बन चुकी है। इसके बावजूद, भारत की यह साफ मांग है कि उसे अन्य एशियाई और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले स्पष्ट रूप से बेहतर और रियायती टैरिफ लाभ मिलना चाहिए, ताकि अमेरिकी बाजार में उसकी हिस्सेदारी किसी भी तरह से कमजोर न पड़े।
यदि ऐसा नहीं होता है और प्रतिद्वंद्वी देशों पर कुल कर का बोझ भारत से कम रहता है, तो इसका सीधा असर हमारे कपड़ा, चमड़ा और अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्रों के निर्यात पर पड़ना तय माना जा रहा है। फिलहाल, वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच कूटनीतिक स्तर पर बातचीत का दौर जारी है और आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि अमेरिकी व्यापार नीति के इन पेच के बीच भारत अपने हितों को किस प्रकार सुरक्षित रख पाता है।
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