New Delhi: देश के कई बाजारों में चीनी की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है। कुछ जगह खुदरा भाव 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। बढ़ती कीमतों और त्योहारों से पहले संभावित मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है।
यह आयात 31 अक्तूबर 2026 तक किया जा सकेगा। करीब एक दशक बाद भारत को घरेलू कीमतों पर दबाव कम करने के लिए इतनी बड़ी मात्रा में चीनी आयात की अनुमति देनी पड़ी है।
लेकिन सवाल है कि आखिर चीनी के दाम इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं? क्या देश में चीनी की कमी हो गई है? मौसम, गन्ने की फसल, एथेनॉल उत्पादन और जमाखोरी का इसमें कितना योगदान है? आइए विस्तार से समझते हैं।
चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह घरेलू उत्पादन में अपेक्षा से कमी और उपलब्धता पर बढ़ता दबाव बताया जा रहा है। सरकार के अनुसार, मौजूदा स्थिति के लिए केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं है। कम उत्पादन, फसल को नुकसान, त्योहारी मौसम से पहले बढ़ती मांग, जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसे कई कारकों ने कीमतों पर दबाव बनाया है। सरकार ने एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्जन को मौजूदा मूल्य वृद्धि की मुख्य वजह मानने से इनकार किया है।
15 अप्रैल 2026 तक देश में 273.90 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हुआ था। इस दौरान 541 चीनी मिलों ने करीब 2,865.21 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई की और औसत चीनी रिकवरी 9.56 प्रतिशत रही। हालांकि बाद में उत्पादन का अनुमान शुरुआती अपेक्षाओं से कम रहने लगा, जिससे बाजार में उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी।

क्या मौसम भी कीमतों की बड़ी वजह है?
हां, मौसम का असर भी गन्ने और चीनी उत्पादन पर पड़ता है। कमजोर या अनियमित बारिश से गन्ने की खेती प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में फसल को बीमारियों और प्रतिकूल मौसम से नुकसान की बात भी सामने आई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गन्ना एक पानी की अधिक जरूरत वाली फसल है। ऐसे में बारिश की स्थिति और जल उपलब्धता उत्पादन अनुमान को प्रभावित कर सकती है। सरकार ने भी हालिया मूल्य वृद्धि के कारणों में उत्पादन में कमी और फसल से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख किया है।

त्योहारों के मौसम में क्यों बढ़ती है चिंता?
भारत में रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान चीनी की खपत बढ़ जाती है। मिठाइयों के अलावा बिस्किट, टॉफी, शीतल पेय और कई खाद्य उत्पादों में भी चीनी का व्यापक इस्तेमाल होता है।
ऐसे समय में यदि बाजार में आपूर्ति पहले से दबाव में हो और मांग तेजी से बढ़ने लगे तो कीमतों में उछाल आ सकता है। इसी त्योहारी मांग से पहले सरकार ने अतिरिक्त चीनी उपलब्ध कराने के लिए आयात की अनुमति दी है।

देश में सबसे ज्यादा चीनी कहां बनती है?
भारत के चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की सबसे बड़ी भूमिका है। 2025-26 के दौरान महाराष्ट्र में करीब 89.80 लाख मीट्रिक टन, उत्तर प्रदेश में 65.60 लाख मीट्रिक टन और कर्नाटक में 41.70 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का अनुमान/आंकड़ा सामने आया है।
इन राज्यों में गन्ने की पैदावार, बारिश और मिलों की उत्पादन क्षमता का असर देशभर की चीनी आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है। इसलिए इन प्रमुख उत्पादक राज्यों में फसल कमजोर होने पर राष्ट्रीय बाजार में भी दबाव बढ़ सकता है।
क्या एथेनॉल उत्पादन भी जिम्मेदार है?
एथेनॉल को लेकर बहस जरूर तेज है, क्योंकि सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देती रही है और गन्ना आधारित कच्चे माल से भी एथेनॉल बनाया जाता है। कुछ विशेषज्ञों ने चीनी और एथेनॉल के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर चिंता जताई है।
हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा चीनी मूल्य वृद्धि के लिए एथेनॉल डायवर्जन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। सरकार के मुताबिक, एथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 के 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत रह गई है। साथ ही देश के कुल एथेनॉल उत्पादन का बड़ा हिस्सा अब गन्ने के बजाय अनाज, विशेष रूप से मक्के जैसे स्रोतों से आ रहा है।
यानी एथेनॉल और चीनी उत्पादन का संबंध जरूर है, लेकिन सरकार के अनुसार मौजूदा कीमतों में तेजी का मुख्य कारण कम उत्पादन, बढ़ती मांग और बाजार से जुड़े अन्य दबाव हैं।
भारत ने चीनी का निर्यात क्यों घटाया?
भारत कभी दुनिया के प्रमुख चीनी निर्यातकों में शामिल रहा है। 2020-21 में देश ने करीब 70 लाख मीट्रिक टन और 2021-22 में रिकॉर्ड करीब 110 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात किया था।
लेकिन इसके बाद सरकार ने घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने को प्राथमिकता दी। निर्यात पर नियंत्रण बढ़ने के साथ विदेशी बाजारों में भेजी जाने वाली चीनी की मात्रा तेजी से कम हुई। 2022-23 में निर्यात करीब 63.08 लाख मीट्रिक टन रहा, जबकि 2023-24 में इसमें भारी गिरावट आई।
अब घरेलू कीमतों में रिकॉर्ड तेजी के बीच भारत ने आयात की अनुमति दी है। यह बदलाव दिखाता है कि सरकार की प्राथमिकता फिलहाल घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने की है।
चीनी पर सरकार का इतना नियंत्रण क्यों है?
भारत में चीनी और गन्ना महत्वपूर्ण उपभोक्ता वस्तुएं हैं। सरकार इनके उत्पादन, बिक्री, भंडारण और आयात-निर्यात पर विभिन्न कानूनों और नियंत्रण आदेशों के जरिए नजर रखती है।
मुख्य नीतिगत बदलाव इस प्रकार हैं:
- 1955: आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत चीनी और गन्ने को नियंत्रित वस्तुओं के दायरे में रखा गया।
- 1966: गन्ना नियंत्रण आदेश के जरिए केंद्र को गन्ने से जुड़े नियमन का अधिकार मिला।
- 2009: पुराने न्यूनतम वैधानिक मूल्य की जगह उचित और लाभकारी मूल्य यानी एफआरपी की व्यवस्था लागू हुई।
- 2018: चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत तय की गई, जिसे बाद में बढ़ाकर 31 रुपये प्रति किलो किया गया।
- 2025: नया Sugar (Control) Order लागू हुआ, जिसके तहत उत्पादन, बिक्री, भंडारण और अन्य गतिविधियों के नियमन के प्रावधान हैं।

जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने क्या किया?
कीमतों को काबू में रखने के लिए सरकार ने भंडारण पर भी सख्ती बढ़ाई है। बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक सीमा लागू की गई है। जो इकाइयां हर महीने 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी इस्तेमाल करती हैं, उन्हें 15 दिन से ज्यादा का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। यह व्यवस्था 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य कृत्रिम कमी और अत्यधिक जमाखोरी की आशंका को रोकना है।

फिर 10 लाख टन चीनी आयात क्यों करनी पड़ी?
घरेलू बाजार में कीमतों पर लगातार दबाव और त्योहारी मौसम से पहले आपूर्ति बढ़ाने की जरूरत को देखते हुए सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को शुल्क-मुक्त आयात करने की अनुमति दी है।
आयात की अनुमति 31 अक्तूबर 2026 तक है। सामान्य तौर पर भारत चीनी आयात पर भारी शुल्क लगाता है, लेकिन इस विशेष व्यवस्था का उद्देश्य अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराकर कीमतों को नियंत्रित करना है। सरकार के इस कदम से घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है।
चीनी कहां से आ सकती है?
भारत के कच्ची चीनी आयात में ऐतिहासिक रूप से ब्राजील एक प्रमुख स्रोत रहा है। ऐसे में इस बार भी ब्राजील महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता हो सकता है। हालांकि दक्षिण अमेरिका से भारत तक समुद्री परिवहन में समय लगता है।
रिपोर्टों के मुताबिक, आयातित चीनी की बड़ी खेपों का असर तुरंत खुदरा बाजार में दिखाई देना जरूरी नहीं है और पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति अक्टूबर के आसपास पहुंच सकती है। हालांकि बंदरगाह आधारित रिफाइनरियों के जरिए कुछ मात्रा अपेक्षाकृत जल्दी घरेलू बाजार में उपलब्ध कराई जा सकती है।

आम आदमी की जेब पर कितना असर?
चीनी की बढ़ती कीमतों का सीधा असर घरों के मासिक बजट पर पड़ रहा है। कई बाजारों में खुदरा कीमतें 58 से 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की खबरें हैं।
उपभोक्ता मामलों से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, 20 अगस्त 2026 को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत 55.70 रुपये प्रति किलो थी। 13 अगस्त को यह 50.98 रुपये, एक महीने पहले 48.18 रुपये और एक साल पहले 46.30 रुपये प्रति किलो थी।
इस हिसाब से औसत खुदरा कीमत:
- एक सप्ताह में: 4.72 रुपये प्रति किलो बढ़ी
- एक महीने में: 7.52 रुपये प्रति किलो बढ़ी
- एक साल में: 9.40 रुपये प्रति किलो बढ़ी
यानी महंगाई का असर केवल घर में इस्तेमाल होने वाली चीनी तक सीमित नहीं रह सकता। मिठाई, बेकरी उत्पाद, पेय पदार्थ और अन्य चीनी आधारित खाद्य वस्तुओं की लागत पर भी दबाव पड़ सकता है।
आगे क्या होगा?
सरकार ने आयात की अनुमति और स्टॉक नियंत्रण जैसे कदम उठाकर बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश की है। 10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात से कीमतों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन इसका असर आयातित खेपों के भारत पहुंचने और घरेलू बाजार में उपलब्ध होने के बाद अधिक स्पष्ट होगा।
फिलहाल सरकार की चुनौती दोहरी है—त्योहारी मौसम में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और बढ़ती कीमतों से उपभोक्ताओं को राहत देना। आने वाले हफ्तों में मौसम, गन्ने की फसल, आयात की गति और बाजार में स्टॉक की स्थिति तय करेगी कि चीनी के दाम स्थिर होते हैं या उपभोक्ताओं की जेब पर दबाव और बढ़ता है।


