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Ranchi University Direct PhD: रांची यूनिवर्सिटी में अब ग्रेजुएशन के बाद सीधे PhD, जानें नए नियम और पूरी पात्रता शर्तें

Ranchi University Direct PhD: झारखंड की राजधानी रांची से उच्च शिक्षा से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है, जो हजारों छात्रों के भविष्य को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाली है। रांची यूनिवर्सिटी ने पीएचडी में दाखिले को लेकर अपने नियमों में बड़ा फेरबदल किया है, और यह बदलाव करीब डेढ़ दशक बाद हुआ है। नई शिक्षा नीति 2020 और यूजीसी रेगुलेशन 2022 के प्रावधानों के तहत लाए गए इस बदलाव के बाद अब चार वर्षीय ग्रेजुएशन कोर्स करने वाले कई छात्र सीधे पीएचडी के लिए आवेदन कर सकेंगे।

सवाल यह उठता है कि आखिर किन छात्रों को इसका फायदा मिलेगा, और पोस्ट ग्रेजुएशन किए बिना पीएचडी का रास्ता खुलने के पीछे यूनिवर्सिटी की क्या सोच रही है। इसे समझने के लिए नए नियमों की पूरी बारीकियों पर नजर डालनी जरूरी है।

Ranchi University Direct PhD: किन छात्रों को मिलेगा सीधे PhD में दाखिले का मौका

रांची यूनिवर्सिटी के नए नियमों के मुताबिक चार वर्षीय ग्रेजुएशन कोर्स में कम से कम 75 फीसदी अंक हासिल करने वाले उम्मीदवार अब पीएचडी के लिए आवेदन कर सकेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे छात्रों के लिए पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री अब अनिवार्य नहीं रह गई है। यानी जो छात्र चार साल की ग्रेजुएशन अच्छे अंकों के साथ पूरी करते हैं, वे मास्टर डिग्री का इंतजार किए बिना सीधे रिसर्च की दुनिया में कदम रख सकते हैं। हालांकि जो छात्र दो वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स की परंपरागत राह अपनाना चाहते हैं, उनके लिए भी रास्ता खुला है, बशर्ते उन्होंने पीजी में कम से कम 55 फीसदी अंक हासिल किए हों। आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए राहत की बात यह है कि उन्हें न्यूनतम पात्रता अंकों में पांच फीसदी की छूट दी जाएगी। यूनिवर्सिटी के कुलपति सरोज शर्मा ने पीएचडी डिग्री से जुड़े इन न्यूनतम मानकों और प्रक्रियाओं को लेकर बाकायदा अधिसूचना जारी कर दी है।

प्रवेश परीक्षा और इंटरव्यू से तय होगा एडमिशन

अब सिर्फ अंक अच्छे होने से ही दाखिला पक्का नहीं होगा। नए नियमों के तहत पीएचडी में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा और इंटरव्यू, दोनों से गुजरना होगा। मेरिट सूची तैयार करते समय प्रवेश परीक्षा और इंटरव्यू में मिले अंकों का वेटेज क्रमशः 70 और 30 फीसदी रखा गया है। यहां एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि पीएचडी एंट्रेंस टेस्ट में आधे सवाल रिसर्च मेथाडोलॉजी से जुड़े होंगे, जबकि बाकी आधे सवाल संबंधित विषय पर आधारित रहेंगे। मतलब सिर्फ विषय की जानकारी काफी नहीं, रिसर्च की बुनियादी समझ भी उतनी ही जरूरी मानी जाएगी।

देखने पर लगता है कि यूनिवर्सिटी उन छात्रों को खास तवज्जो देना चाहती है, जिन्होंने पहले से नेट या जेआरएफ जैसी कठिन परीक्षाएं पास कर रखी हैं। ऐसे नेट जेआरएफ क्वालिफाइड उम्मीदवारों को प्रवेश परीक्षा से पूरी तरह छूट दे दी गई है, और उनका चयन सीधे इंटरव्यू के आधार पर किया जाएगा। यह प्रावधान उन मेधावी छात्रों के लिए राहत भरा है, जो पहले ही राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में अपनी काबिलियत साबित कर चुके हैं।

PhD पूरी करने की समयसीमा को लेकर क्या तय हुआ

पीएचडी में दाखिला मिलने के बाद रिसर्चर को शुरुआत में 12 क्रेडिट का कोर्स वर्क पूरा करना अनिवार्य होगा, तभी वे अपनी रिसर्च प्रक्रिया को आगे बढ़ा पाएंगे। नए नियमों में पीएचडी पूरी करने की समयसीमा को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत न्यूनतम तीन साल में पीएचडी पूरी करनी होगी, जबकि अधिकतम समयसीमा छह साल तय की गई है। अगर कोई रिसर्चर छह साल में भी अपना काम पूरा नहीं कर पाता, तो उसे दो साल के लिए दोबारा रजिस्ट्रेशन कराने का विकल्प मिलेगा। हालांकि इसके बाद किसी तरह का और विस्तार देने का प्रावधान नियमों में नहीं रखा गया है।

महिला और दिव्यांग रिसर्चर्स के लिए खास छूट

यहां एक और अहम प्रावधान ऐसा है, जो कई रिसर्चर्स के लिए राहत की खबर साबित हो सकता है। महिला रिसर्चर और 40 फीसदी से ज्यादा दिव्यांगता वाले रिसर्चर को समयसीमा में अतिरिक्त दो साल की छूट दी जाएगी। इसके अलावा नए नियमों में महिला रिसर्चर्स के लिए 240 दिन तक मैटरनिटी या चाइल्ड केयर लीव देने का भी प्रावधान जोड़ा गया है। जानकार बताते हैं कि इस तरह की व्यवस्था से उन महिला शोधार्थियों को खासा फायदा मिलेगा, जो मातृत्व और करियर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में अक्सर पीछे छूट जाती थीं।

Ranchi University Direct PhD: छात्रों के लिए इसका क्या मतलब है

यह बदलाव सीधे तौर पर उन छात्रों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जो कम उम्र में ही रिसर्च की दुनिया में कदम रखना चाहते हैं। अब तक ज्यादातर छात्रों को पीएचडी से पहले लंबा रास्ता तय करना पड़ता था, ग्रेजुएशन के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन, फिर कहीं जाकर पीएचडी में दाखिला मिलता था। नए नियम इस पूरे सफर को छोटा कर सकते हैं, बशर्ते छात्र चार वर्षीय ग्रेजुएशन में तय मानक के मुताबिक अंक हासिल करें। यह बदलाव न सिर्फ समय बचाएगा, बल्कि उन छात्रों को भी प्रोत्साहित करेगा जो जल्दी रिसर्च फील्ड में अपना करियर बनाना चाहते हैं।

कुल मिलाकर रांची यूनिवर्सिटी का यह फैसला उच्च शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में एक अहम बदलाव माना जा रहा है। चार वर्षीय ग्रेजुएशन के बाद सीधे पीएचडी का रास्ता खुलना, प्रवेश परीक्षा और इंटरव्यू की नई व्यवस्था, और महिला व दिव्यांग रिसर्चर्स के लिए विशेष छूट, ये सभी प्रावधान मिलकर एक ज्यादा समावेशी और सुगम व्यवस्था बनाने की कोशिश करते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले सत्र में कितने छात्र इस नए रास्ते का फायदा उठाते हैं।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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