Jharkhand Mining Protest: झारखंड के औद्योगिक क्षेत्र में एक बार फिर रोजगार और स्थानीय अधिकारों को लेकर असंतोष गहरा गया है। राखा कॉपर, केंदाडीह और सुरदा माइंस के आसपास के प्रभावित क्षेत्रों के स्थानीय कारोबारियों, ट्रांसपोर्टरों और श्रमिक संगठनों ने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सालों से विस्थापन और प्रदूषण का दंश झेलने के बावजूद उन्हें रोजगार के अवसरों से पूरी तरह वंचित रखा जा रहा है। अब इन लोगों ने एकजुट होकर प्रबंधन को चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को नहीं माना गया तो क्षेत्र में बड़ा आंदोलन शुरू किया जाएगा।
यह मामला केवल ठेकों के आवंटन का नहीं है, बल्कि उस क्षेत्रीय आर्थिक न्याय का है जिसका वादा खनन परियोजनाओं के शुरू होने के समय किया गया था। प्रभावित क्षेत्रों के स्थानीय वेंडर्स और स्टार्टअप्स का कहना है कि 2017 में इंडियन रिसोर्सेज लिमिटेड के जाने के बाद से स्थिति और खराब हो गई है। पिछले दस सालों में प्रबंधन ने कभी भी स्थानीय इकाइयों को मुख्यधारा में शामिल करने की कोशिश नहीं की। बड़ी कंपनियों को काम देने के नाम पर स्थानीय लोगों की अनदेखी की जा रही है, जिससे सैकड़ों परिवारों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
Jharkhand Mining Protest: क्या है स्थानीय लोगों की मुख्य शिकायत?
स्थानीय स्तर पर काम करने वाले व्यवसायियों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि HCL की नीतियां बेहद अस्पष्ट हैं। उनका कहना है कि ‘जीरो किलोमीटर वेंडर्स’ या स्थानीय एमएसएमई के लिए कोई भी पारदर्शी नीति जमीन पर लागू नहीं है। बड़े ग्लोबल टेंडर और माइनिंग कॉन्ट्रैक्ट्स में स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित करने का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। इससे बाहर की कंपनियां मनमानी कर रही हैं। सुरदा, केंदाडीह और राखा के निवासियों का कहना है कि उनकी जमीनें ली गईं, उनके गांव उजड़े, लेकिन जब काम देने की बात आई तो बाहरी एजेंसियों को प्राथमिकता दी गई।
विशेष रूप से आरके अर्थ रिसोर्स प्राइवेट लिमिटेड, एसके खेतान और साउथ वेस्ट माइनिंग कंपनी जैसी एजेंसियों पर आरोप है कि वे स्थानीय संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद काम के लिए बाहरी लोगों को लेकर आ रहे हैं। प्रभावित क्षेत्र के युवाओं और छोटे उद्यमियों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार की जो एमएसएमई और स्टार्टअप नीतियां हैं, उनका लाभ भी उन तक नहीं पहुंच पा रहा है। वेंडर रजिस्ट्रेशन या वर्क अलॉटमेंट की पूरी प्रक्रिया बंद कमरों में तय होती है, जिसमें पारदर्शिता का दूर दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है।
आर्थिक संकट की चपेट में स्थानीय परिवार
घाटशिला और आसपास के इलाकों के ट्रांसपोर्टर्स और लेबर सप्लायर्स का कहना है कि काम न मिलने से उनके ऊपर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। एक तरफ जहां भारी मशीनों और ट्रकों का संचालन क्षेत्र की सड़कों को तोड़ रहा है और धूल से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है, वहीं दूसरी तरफ काम के नाम पर स्थानीय ट्रक मालिकों और श्रमिकों को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह स्थिति सामाजिक असंतोष को जन्म दे रही है। स्थानीय लोगों ने मीडिया के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि वे भीख नहीं मांग रहे, बल्कि अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं।
यदि खनन कार्य हमारे क्षेत्र में हो रहा है, तो उसका लाभ भी सबसे पहले यहां के लोगों को मिलना चाहिए। स्थानीय लोगों का गुस्सा अब सड़कों पर उतरने की कगार पर है। उनका तर्क है कि अगर प्रबंधन के पास लिखित नीति होती, तो आज यह नौबत नहीं आती। अब तक प्रबंधन ने केवल मौखिक आश्वासन दिए हैं, लेकिन जमीन पर कोई बदलाव देखने को नहीं मिला। इसीलिए, अब इन लोगों ने सीधे तौर पर एक लिखित प्राथमिकता नीति की मांग रखी है, ताकि भविष्य में होने वाले टेंडरों में स्थानीय इकाइयों को दरकिनार न किया जा सके।
Jharkhand Mining Protest: प्रमुख मांगें और भविष्य की रणनीति
स्थानीय संगठनों ने प्रबंधन के सामने कुल सात सूत्रीय मांगें रखी हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण टेंडर में स्थानीय भागीदारी का क्लॉज शामिल है। उनकी मांग है कि हर बड़े टेंडर में कम से कम 40 फीसदी काम स्थानीय इकाइयों को मिलना अनिवार्य होना चाहिए। इसके साथ ही, पिछले 10 सालों में दिए गए सभी कार्यों की एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जानी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि कितना काम स्थानीय लोगों को मिला और कितना बाहरी कंपनियों ने हड़पा।
इसके अलावा, वेंडर एनपैनलमेंट ड्राइव चलाने की मांग भी जोर पकड़ रही है। उनका कहना है कि HCL और जिला प्रशासन को मिलकर स्टार्टअप ऑनबोर्डिंग और ट्रांसपोर्टर रजिस्ट्रेशन शिविर लगाने चाहिए। सबसे अहम मांग बाहरी एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की है। जो कंपनियां स्थानीय लोगों को अवसर नहीं दे रही हैं, उनके खिलाफ अनुबंध रद्द करने की कार्रवाई होनी चाहिए। एक संयुक्त निगरानी समिति बनाने का सुझाव भी दिया गया है, जिसमें जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधि और स्थानीय प्रतिनिधि शामिल हों, ताकि हर महीने कार्यों के आवंटन पर नजर रखी जा सके।
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