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Maharashtra Politics: सियासी शतरंज का गढ़ महाराष्ट्र, दशकों से जारी बगावत और दल-बदल की इनसाइड स्टोरी

Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है, जहां स्क्रिप्ट हर कुछ साल में बदल जाती है। एक सुबह जो विरोधी होते हैं, दोपहर तक वे गठबंधन का हिस्सा बन जाते हैं और शाम होते-होते नई सरकार की शपथ हो जाती है। यह कोई आज की बात नहीं है, बल्कि दशकों से राज्य की राजनीति का डीएनए ही ऐसा रहा है। इंदिरा गांधी के दौर से शुरू हुई यह सियासत आज शिवसेना और एनसीपी के विभाजन तक पहुंच चुकी है। जब भी महाराष्ट्र में कोई सरकार गिरती है या पार्टी में टूट होती है, तो इतिहास के पन्ने खुद को दोहराते नजर आते हैं।

इस समय एक बार फिर चर्चाओं का दौर तेज है कि क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना एक और बड़े विभाजन की ओर बढ़ रही है? हालांकि, यह समझना जरूरी है कि आज महाराष्ट्र जिस मुकाम पर खड़ा है, उसकी पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। दल-बदल, वफादारी का टूटना और सत्ता के लिए नए समीकरण बनाना महाराष्ट्र की राजनीति की एक ऐसी पुरानी आदत है, जिसने यहां के लोकतांत्रिक ढांचे को गहरे तक प्रभावित किया है।

Maharashtra Politics: 1969 की वो चिंगारी जिसने बदल दी कांग्रेस

आधुनिक भारतीय राजनीति में कांग्रेस का विभाजन 1969 में हुआ था। तब इंदिरा गांधी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, लेकिन उन्होंने सांसदों के बहुमत का हवाला देकर अपनी सत्ता बचा ली थी। महाराष्ट्र में इसका असर यह हुआ कि कई बड़े नेता इंदिरा गांधी के साथ चले गए, जिनमें यशवंतराव चव्हाण और उनके होनहार शिष्य शरद पवार भी शामिल थे। तब से ही महाराष्ट्र की राजनीति में ‘वफादारी’ और ‘मौकापरस्ती’ के बीच एक पतली लकीर खिंचने लगी थी, जो आज तक कायम है।

पवार की वो पहली बगावत और मुख्यमंत्री की कुर्सी

शरद पवार की पहली बड़ी राजनीतिक बगावत 1978 में हुई थी। तब वे यशवंतराव चव्हाण के साथ कांग्रेस (यू) में थे। इंदिरा गांधी की हार के बाद कांग्रेस दो हिस्सों में बंट चुकी थी। पवार ने जनता पार्टी के साथ मिलकर ‘प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट’ की सरकार बनाई और महज 38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बन गए। यह महाराष्ट्र के इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक विद्रोह माना जाता है। हालांकि, 1980 में इंदिरा गांधी ने केंद्र में वापसी की और उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई। इसके बावजूद, पवार का कांग्रेस के साथ रिश्ता हमेशा लचीला रहा। वे आते-जाते रहे और कई बार उन्होंने दिखाया कि राजनीति में कोई भी दुश्मन स्थायी नहीं होता।

शिवसेना का उदय और भाजपा के साथ गठबंधन

1966 में बाल ठाकरे ने जब शिवसेना की स्थापना की, तो उनका मकसद केवल मराठी मानुस के हितों की रक्षा करना था। देखते ही देखते मुंबई की सड़कों पर शिवसेना का दबदबा बढ़ गया। दशकों तक शिवसेना और भाजपा का गठबंधन महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ बना रहा। लेकिन 2014 के बाद बदली हुई राष्ट्रीय राजनीति में यह संतुलन बिगड़ने लगा। जब भाजपा ने खुद को एक बड़ी राष्ट्रीय ताकत के रूप में स्थापित किया, तो शिवसेना ने महसूस किया कि उसकी अहमियत कम हो रही है। यही वह दौर था जिसने आगे चलकर 2019 के बड़े टकराव की नींव रखी।

2019 की पांच दिन की सरकार और महा विकास अघाड़ी

महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे अप्रत्याशित अध्याय 2019 में लिखा गया। चुनाव के बाद सीएम पद को लेकर भाजपा-शिवसेना अलग हुए, तो सुबह-सुबह देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री की शपथ ले ली। यह सरकार केवल पांच दिन चली। इसके बाद शरद पवार की सूझबूझ से महा विकास अघाड़ी (MVA) का गठन हुआ और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने। इस गठबंधन ने साबित कर दिया कि विचारधाराओं से ऊपर उठकर सत्ता के लिए हाथ मिलाना इस राज्य की राजनीति की असल सच्चाई है।

2022 और 2023 की बड़ी टूट: पार्टी पर कब्जे की जंग

भाजपा ने अपना मौका जून 2022 में ढूंढा। शिवसेना के दिग्गज नेता एकनाथ शिंदे ने पार्टी के दो-तिहाई विधायकों को साथ लेकर बगावत कर दी। उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई और शिंदे मुख्यमंत्री बन गए। चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को ही असली शिवसेना माना और तीर-कमान का निशान उन्हें सौंप दिया। इसके ठीक एक साल बाद, जुलाई 2023 में अजित पवार ने एनसीपी में बगावत की और शिंदे सरकार में शामिल हो गए। आज उद्धव ठाकरे और शरद पवार अपनी ही पार्टियों के नाम और चुनाव चिह्नों के बिना एक नई लड़ाई लड़ रहे हैं।

Maharashtra Politics: 2026 में क्या फिर बदल रहे हैं समीकरण?

अब वर्ष 2026 में हालात फिर करवट लेते दिख रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे गुट के कुछ सांसदों के अलग होने की चर्चा जोरों पर है। हालांकि, महाराष्ट्र की राजनीति में अब पहले जैसा दम नहीं रहा। जो शिवसेना कभी मुंबई की बीएमसी (नगर निगम) पर एकछत्र राज करती थी, आज उसका वहां अस्तित्व बहुत कमजोर हो गया है। निकाय चुनावों में भाजपा ने बढ़त हासिल की है। उद्धव गुट के पास आज महाराष्ट्र में केवल एक मेयर का पद बचा है।

Maharashtra Politics: राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं

महाराष्ट्र की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर है जहां वफादारी बाजार की वस्तु बन गई है। दल-बदल की जो संस्कृति 60 के दशक में शुरू हुई थी, उसने अब इतना विकराल रूप ले लिया है कि मतदाता भी भ्रमित हैं। नेताओं का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाना अब सामान्य हो चला है। इतिहास गवाह है कि जो आज सत्ता के केंद्र में हैं, कल वे विपक्ष का हिस्सा हो सकते हैं। महाराष्ट्र की यह सियासी कहानी बताती है कि यहां कुर्सी का खेल कभी खत्म नहीं होता, केवल खिलाड़ियों के चेहरे और समय के साथ गठबंधन बदलते रहते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उद्धव ठाकरे अपनी बची-खुची साख को बचा पाते हैं, या महाराष्ट्र एक और राजनीतिक उलटफेर के लिए तैयार है।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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