Shibu Soren Padma Bhushan: आज मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में एक ऐसा पल आएगा जो झारखंड के लाखों आदिवासियों के दिल को छू जाएगा। दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान, पद्म भूषण, दिया जाएगा। उनकी पत्नी रूपी सोरेन यह सम्मान ग्रहण करेंगी। तबीयत ठीक न होने के बावजूद वह दिल्ली पहुंची हैं। बहू और विधायक कल्पना सोरेन उनके साथ हैं। पूरे झारखंड की नजरें आज इस समारोह पर टिकी हैं।
Shibu Soren Padma Bhushan: रूपी सोरेन की हिम्मत को सलाम
बीमारी में भी सम्मान लेने आना, यह अपने आप में एक बड़ी बात है। रूपी सोरेन की तबीयत ठीक नहीं है, लेकिन वह अपने पति के लिए मिलने वाले इस सम्मान को खुद जाकर लेना चाहती थीं। सोमवार को कल्पना सोरेन उन्हें लेकर दिल्ली रवाना हुईं। परिवार के कुछ अन्य सदस्य भी आज के अलंकरण समारोह में शामिल हो सकते हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु आज राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस समारोह में शिबू सोरेन को यह सम्मान प्रदान करेंगी। यह बात भी खास है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु खुद झारखंड की आदिवासी समाज से आती हैं। ऐसे में जब वह किसी आदिवासी नेता को यह सम्मान देती हैं तो इसका अर्थ और भी गहरा हो जाता है।
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हुई थी घोषणा
केंद्र सरकार ने इसी साल जनवरी में गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले यह एलान किया था कि शिबू सोरेन को पद्म भूषण से नवाजा जाएगा। यह सम्मान उनके पूरे जीवन के संघर्ष को मान्यता देता है। आदिवासी समाज को मजबूत करने, उनके हकों की लड़ाई लड़ने और झारखंड राज्य बनाने में उनकी अहम भूमिका को देखते हुए यह फैसला किया गया।
शिबू सोरेन का नाम झारखंड आंदोलन का पर्याय बन चुका है। दशकों तक उन्होंने अलग राज्य की मांग को आवाज दी। साल 2000 में जब झारखंड राज्य बना तो इसमें उनका योगदान किसी से छिपा नहीं था।
Shibu Soren Padma Bhushan: कौन थे शिबू सोरेन, क्यों कहते थे दिशोम गुरु
शिबू सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक नेता थे। “दिशोम गुरु” यानी देश के गुरु, यह उपाधि उन्हें आदिवासी समाज ने खुद दी थी। वह कई बार केंद्र में मंत्री भी रहे और झारखंड के मुख्यमंत्री भी बने।
लेकिन उनकी असली पहचान किसी कुर्सी से नहीं बनी। उनकी पहचान बनी उस लड़ाई से जो उन्होंने आदिवासियों की जमीन, संस्कृति और सम्मान बचाने के लिए लड़ी। महाजनी प्रथा के खिलाफ उनकी लड़ाई ने उन्हें आम जनता का नेता बनाया। वह मानते थे कि आदिवासियों को उनकी जमीन और जंगल से अलग किया जा रहा है और यह सिलसिला रोकना जरूरी है।
नशा छोड़ो, खेती करो, पढ़ो और आगे बढ़ो
शिबू सोरेन के भाषण बड़े सरल होते थे। कोई बड़े बड़े शब्द नहीं, कोई लंबी लंबी बातें नहीं। वह सीधे कहते थे कि नशा छोड़ो, खेती करो, मुर्गी और बत्तख पालो, बच्चों को स्कूल भेजो। उनका कहना था कि नशा आदिवासी समाज को अंदर से खोखला कर रहा है। यह कमजोरी की वजह बन रहा है। जब समाज कमजोर होता है तो उसकी जमीन छिनती है, उसका सम्मान जाता है। इसलिए वह हर सभा में नशे के खिलाफ बोलते थे।
नौकरी के पीछे भागने की जगह वह पशुपालन और खेती को बढ़ावा देते थे। उनका मानना था कि आदिवासी समाज की ताकत उसकी अपनी जमीन और मेहनत में है। शिक्षा के बारे में वह कहते थे कि पढ़ाई वह चाबी है जो शोषण की जंजीर तोड़ सकती है। आज भी झारखंड के कई गांवों में उनके अनुयायी उनके बताए रास्ते पर चल रहे हैं। खेती, पशुपालन और शिक्षा, यही उनका तीन सूत्री संदेश था जो आज भी जिंदा है।
Shibu Soren Padma Bhushan: जब विदाई में उमड़ा था जनसैलाब
शिबू सोरेन के जाने के बाद नेमरा में उनकी अंत्येष्टि के वक्त जो दृश्य था वह लोग आज भी भूले नहीं हैं। लाखों लोग वहां पहुंचे थे। झारखंड के कोने कोने से और पड़ोसी राज्यों से भी लोग आए थे। आम और खास का फर्क उस दिन मिट गया था। हर किसी की आंखें नम थीं। सबने “अंतिम जोहार” कहकर उन्हें विदाई दी। वह भीड़ बता रही थी कि शिबू सोरेन सिर्फ एक राजनेता नहीं थे। वह एक भावना थे, एक आंदोलन थे, एक आवाज थे जो करोड़ों दिलों में बसती थी।
Shibu Soren Padma Bhushan: झारखंड के लिए गर्व का दिन
आज का यह दिन झारखंड के लिए सिर्फ एक समारोह नहीं है। यह उस पूरे संघर्ष की मान्यता है जो दशकों तक चला। जब राष्ट्रपति भवन में रूपी सोरेन के हाथ में पद्म भूषण आएगा, तो वह सम्मान सिर्फ एक परिवार को नहीं मिलेगा, वह सम्मान उन लाखों आदिवासियों को मिलेगा जिन्होंने शिबू सोरेन के साथ कदम मिलाकर चले।
दिशोम गुरु के सपने आज भी अधूरे नहीं हैं। उनके अनुयायी, उनका परिवार और उनके विचार आज भी झारखंड की धरती पर जिंदा हैं। पद्म भूषण उस जिंदगी का सम्मान है जो उन्होंने दूसरों के लिए जी।
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