Supreme Court Judge Practice Rule: निचली अदालतों में जज बनने का सपना देख रहे हजारों युवा वकीलों के लिए शुक्रवार का दिन बड़ी खुशखबरी लेकर आया। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में जज बनने के लिए अनिवार्य वकालत के अनुभव को तीन साल से घटाकर सिर्फ एक साल कर दिया है। यह फैसला उन तमाम नए लॉ ग्रेजुएट्स के लिए राहत की खबर है, जो पिछले नियम की वजह से मुश्किल में फंसे हुए थे।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह कोई नया नियम नहीं, बल्कि खुद अदालत के अपने पुराने फैसले में किया गया बड़ा संशोधन है। आखिर सुप्रीम कोर्ट को अपने ही आदेश में इतना बड़ा बदलाव क्यों करना पड़ा, और इससे किन उम्मीदवारों को सीधा फायदा मिलेगा, यह समझना हर लॉ स्टूडेंट और युवा वकील के लिए जरूरी है।
Supreme Court Judge Practice Rule: क्या है सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने मई 2025 के फैसले में संशोधन करते हुए एंट्री-लेवल न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए तीन साल की अनिवार्य वकालत की शर्त को घटाकर एक साल कर दिया है। यह फैसला चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ए.जी. मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने सुनाया।
बेंच ने 2-1 के बहुमत से यह अहम फैसला लेते हुए इस मामले में दाखिल समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया। यानी अब यह संशोधित नियम ही आगे की प्रक्रिया के लिए मान्य होगा।
अब सिर्फ 1 साल के अनुभव से मिलेगा परीक्षा में बैठने का मौका
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब उम्मीदवारों को न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने के लिए तीन साल की बजाय सिर्फ एक साल का वकालत का अनुभव होना पर्याप्त होगा। यह बदलाव सीधे तौर पर उन युवाओं के लिए राहत लेकर आया है, जो लॉ की डिग्री तो ले चुके थे, लेकिन तीन साल के अनिवार्य अनुभव की शर्त की वजह से परीक्षा से दूर हो गए थे।
यहीं पर एक ऐसी बात सामने आती है, जो कई उम्मीदवारों के लिए और भी बड़ी राहत साबित होगी। जिन न्यायिक परीक्षाओं के नोटिफिकेशन 25 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होंगे, उनमें तो अनुभव की शर्त पूरी तरह हटा दी गई है। यानी इस खास अवधि के दौरान बिना किसी वकालत के अनुभव वाले उम्मीदवार भी सीधे परीक्षा में बैठ सकेंगे।
बिना अनुभव चुने गए उम्मीदवारों के लिए भी है शर्त
हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बिना अनुभव के चुने गए उम्मीदवार सीधे जज की कुर्सी संभाल लेंगे। मामला कुछ इस तरह से है कि ऐसे उम्मीदवारों को पहले एक साल के लिए ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर के तौर पर काम करना होगा।
इसके साथ ही उन्हें एक साल की स्ट्रक्चर्ड क्लर्कशिप से भी गुजरना अनिवार्य होगा। यानी अदालत ने अनुभव की अनिवार्यता को पूरी तरह खत्म नहीं किया, बल्कि इसे परीक्षा के बाद की ट्रेनिंग प्रक्रिया में शामिल कर दिया है।
1 अप्रैल 2027 से लागू होगा नया संशोधित नियम
अब बात करते हैं इस फैसले के टाइमलाइन की, जो समझने के लिए थोड़ा ध्यान देने वाला हिस्सा है। जिन परीक्षाओं के नोटिफिकेशन 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होंगे, उन पर नया संशोधित नियम यानी एक साल के अनुभव वाली शर्त पूरी तरह लागू होगी।
इसका सीधा मतलब है कि 25 मई 2025 से 31 मार्च 2027 तक का समय एक तरह की ट्रांजिशन अवधि है, जिसमें उम्मीदवारों को खास राहत दी गई है। इसके बाद स्थायी रूप से एक साल के अनुभव की शर्त लागू हो जाएगी।
आखिर कोर्ट ने क्यों दी यह राहत, यहीं है असली टि्वस्ट
यहीं पर मामले का वह पहलू सामने आता है, जो सबसे ज्यादा दिलचस्प है। सुप्रीम कोर्ट ने खुद स्वीकार किया कि मई 2025 में बिना किसी ट्रांजिशन पीरियड के अचानक तीन साल की प्रैक्टिस का नियम लागू कर देना नए लॉ ग्रेजुएट्स और युवा वकीलों के लिए भारी मुश्किल खड़ी कर गया था।
देखने पर लगता है कि अदालत ने अपनी ही पुरानी व्यवस्था की खामी को पहचाना और उसे सुधारने की कोशिश की। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि जज बनने के लिए वकालत के पेशे का अनुभव होना जरूरी माना जाता है, बस इस नियम की वजह से युवाओं को अचानक असुविधा नहीं होनी चाहिए।
मई 2025 से जुलाई 2025 तक कैसे बदलता गया मामला
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना जरूरी है। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने फ्रेश लॉ ग्रेजुएट्स के सीधे जज बनने की परीक्षा पर रोक लगाते हुए कम से कम तीन साल की वकालत की शर्त को अनिवार्य कर दिया था।
इसके बाद जुलाई 2025 में अदालत ने इस फैसले के खिलाफ दाखिल हुई पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था। अब करीब एक साल बाद, इसी रिव्यू पिटीशन पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने तीन साल की शर्त को घटाकर एक साल कर दिया है, साथ ही बीच के समय के लिए विशेष राहत भी दी है।
Supreme Court Judge Practice Rule: युवा वकीलों और लॉ स्टूडेंट्स के लिए क्यों अहम है यह फैसला
देश भर में हर साल हजारों छात्र लॉ की डिग्री पूरी करते हैं, और इनमें से बड़ी संख्या न्यायिक सेवा में करियर बनाने का सपना देखती है। तीन साल की अनिवार्य वकालत की शर्त ने पिछले कुछ समय से इन छात्रों के सामने एक बड़ी रुकावट खड़ी कर दी थी।
अब जब यह शर्त घटाकर एक साल कर दी गई है, तो जानकार मानते हैं कि इससे न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवारों की संख्या बढ़ सकती है। खासकर वे छात्र जो हाल ही में लॉ ग्रेजुएट हुए हैं, उनके लिए यह मौका किसी वरदान से कम नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला साफ दिखाता है कि अदालत खुद अपनी पुरानी व्यवस्थाओं की समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार लाने से पीछे नहीं हटती। युवा वकीलों के लिए यह एक साथ राहत और नई शुरुआत का मौका दोनों लेकर आया है। अब आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि इस संशोधित नियम के तहत कितने नए उम्मीदवार परीक्षा में हिस्सा लेते हैं। न्यायिक सेवा से जुड़ी आगे की अधिसूचनाओं पर अब सबकी नजर टिकी रहेगी।
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