Sajjan Kumar Death: 1984 के सिख विरोधी दंगों के दोषी और कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का निधन हो गया है। 80 वर्षीय सज्जन कुमार लंबे समय से कई बीमारियों से जूझ रहे थे, और तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। लेकिन उनके निधन के साथ ही एक पुराना सवाल फिर से जिंदा हो गया है, क्या 1984 के दंगों का दर्द अब कभी पूरी तरह भर पाएगा?
सज्जन कुमार का नाम दशकों तक 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़ा रहा, और आखिरकार 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद फरवरी 2025 में एक अदालत ने उन्हें दिल्ली में दो सिखों की हत्या के एक और मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई। अस्पताल ने अब तक उनके निधन के कारणों का खुलासा नहीं किया है।
Sajjan Kumar Death: कौन थे सज्जन कुमार
सज्जन कुमार कांग्रेस के पुराने नेता रहे हैं, और 1970 के दशक से ही दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1977 में दिल्ली नगर निगम के चुनाव से की और पार्षद चुने गए। इसके बाद 1980 में उन्होंने लोकसभा चुनाव में चौधरी ब्रह्म प्रकाश को हराकर पहली बार सांसद बनने का सफर तय किया।
1984 में सज्जन कुमार पर सिख विरोधी दंगों में शामिल होने का आरोप लगा, और उसी साल हुए आम चुनावों में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया था। हालांकि 1991 में वे एक बार फिर सांसद चुने गए। इसके बाद उन्हें संसद में लौटने के लिए करीब 13 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। साल 2004 में कांग्रेस ने उन्हें बाहरी दिल्ली सीट से टिकट दिया, और वे फिर से सांसद बने। लेकिन 2018 में दोषी ठहराए जाने के बाद उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।
1984 के दंगों की वो काली रात
31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे। यह दौर भारत के इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में गिना जाता है।
सज्जन कुमार से जुड़ा पहला मामला दिल्ली छावनी इलाके में पांच सिखों की हत्या से जुड़ा था। राजनगर इलाके में केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुविंदर सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में जगदीश कौर प्रमुख शिकायतकर्ता और चश्मदीद रहीं, जिनके पति और बेटे को इसी दंगे में मार डाला गया था।
जिंदा जलाए जाने की दर्दनाक कहानी
इसी दौरान एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई थी। पीड़ितों के वकील रहे एचएस फूलका के मुताबिक, 1 नवंबर 1984 को जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह को पश्चिमी दिल्ली में जिंदा जला दिया गया था। उनके घर को भी लूट लिया गया, और परिवार की महिलाओं को भीड़ ने बुरी तरह पीटा था। फूलका का दावा है कि इस भीड़ का नेतृत्व सज्जन कुमार खुद कर रहे थे।
इस मामले में जसवंत सिंह की बेटी ने गवाही में बताया था कि भीड़ हजारों की संख्या में थी, और उनके पास ईंटें, लाठियां और लोहे की छड़ें थीं। भीड़ ने उन पर हमला कर उनके सिर पर ईंट से वार किया। बाद में मृतक की पत्नी ने न्यायमूर्ति जेडी जैन और न्यायमूर्ति डीके अग्रवाल की समिति के सामने बयान दर्ज कराते हुए एक पत्रिका में छपी तस्वीर से आरोपी की पहचान की थी।
जांच और कानूनी कार्रवाई का लंबा सफर
जस्टिस जीटी नानावती आयोग की सिफारिशों के बाद साल 2005 में सज्जन कुमार और अन्य आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद सीबीआई ने जनवरी 2010 में उनके खिलाफ दो चार्जशीट दाखिल कीं। जांच और सुनवाई की यह प्रक्रिया वर्षों तक चली, और आखिरकार 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। देखने पर लगता है कि यह पूरा मामला सिर्फ एक अदालती फैसले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सिख समुदाय के लिए यह दशकों तक इंसाफ की लड़ाई का प्रतीक बना रहा।
Sajjan Kumar Death: निधन पर आई प्रतिक्रियाएं
सज्जन कुमार के निधन पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के एक्जीक्यूटिव मेंबर सुरजीत सिंह गढ़ी ने कहा कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो कुछ हुआ था, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका कहना था कि वो जख्म आज भी हरे हैं, और सज्जन कुमार ने कभी इस घटना पर पछतावा नहीं जताया।
वहीं कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे दुखद बताया और परिवार के प्रति संवेदना जताई। जाहिर है, सज्जन कुमार के निधन को लेकर अलग-अलग पक्षों की प्रतिक्रियाएं काफी अलग-अलग रही हैं, जो इस मामले की संवेदनशीलता को दर्शाती हैं।
1984 के सिख विरोधी दंगे भारतीय राजनीति और समाज के लिए आज भी एक गहरा जख्म हैं, और सज्जन कुमार का नाम इस पूरे प्रकरण से हमेशा के लिए जुड़ा रहेगा। उनके निधन के साथ इस लंबी कानूनी लड़ाई का एक अध्याय जरूर बंद हुआ है, लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए न्याय और स्मृति का सिलसिला अभी भी जारी है। आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़ी और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।
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