Maharashtra Government Rules: महाराष्ट्र की सियासत में सत्ता के समीकरण बदलने वाला एक बड़ा फैसला सामने आया है। राज्य सरकार ने सरकार चलाने के तरीके से जुड़े नियमों में बदलाव किया है, और इस बदलाव ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर बना दिया है। नए नियमों के मुताबिक अब मुख्यमंत्री चाहें तो राज्य के किसी भी मंत्री या विभाग के फैसले को पलट सकते हैं। यानी कोई मंत्री कुछ भी तय करे, अगर मुख्यमंत्री को वह फैसला सही नहीं लगा, तो वे उसे बदल भी सकते हैं और रद्द भी कर सकते हैं। सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े अधिकार अचानक मुख्यमंत्री के हाथ में क्यों आ गए, और इसके पीछे कौन सी अदालती लड़ाई छिपी है।
यह बदलाव कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक पुराना कानूनी विवाद और कोर्ट का फैसला जिम्मेदार है। देखने पर लगता है कि सरकार ने काफी सोच-समझकर इस कानूनी कमी को दूर करने की कोशिश की है, ताकि भविष्य में मुख्यमंत्री की ताकत को अदालत में चुनौती न दी जा सके।
Maharashtra Government Rules: 14 अगस्त को नोटिफाई हुए नए नियम
महाराष्ट्र सरकार ने 14 अगस्त को ‘महाराष्ट्र सरकार के कामकाज के नियम, 2026’ को औपचारिक रूप से नोटिफाई किया। इन नियमों ने साल 1975 से चले आ रहे उन पुराने नियमों की जगह ली है, जो पिछले 51 सालों से राज्य में सरकार के कामकाज का आधार बने हुए थे। इतने लंबे समय बाद आया यह बदलाव अपने आप में बड़ी बात है, क्योंकि सरकार चलाने के तरीके से जुड़े ऐसे नियम आमतौर पर दशकों तक नहीं बदले जाते।
नए नियमों के तहत मुख्यमंत्री अब जनहित का हवाला देकर किसी भी कैबिनेट मंत्री के फैसले में दखल दे सकते हैं। इतना ही नहीं, जरूरत पड़ने पर वे उस फैसले को पूरी तरह बदल भी सकते हैं या रद्द भी कर सकते हैं। यह अधिकार पहले मुख्यमंत्री के पास इस तरह स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं था।
फाइलें रोकने का अधिकार अब मंत्रियों के पास नहीं
नए नियमों में एक और अहम प्रावधान जोड़ा गया है। अब मुख्यमंत्री किसी भी विभाग के दस्तावेज या रिकॉर्ड सीधे अपने पास समीक्षा के लिए मंगा सकते हैं। विभागीय मंत्री और सचिव चाहें तो भी मांगी गई फाइलों को रोकने से इनकार नहीं कर सकते।
हालांकि पूरी तरह मनमानी न हो, इसके लिए एक शर्त भी रखी गई है। अगर मुख्यमंत्री किसी मंत्री का फैसला बदलना चाहते हैं, तो उन्हें इसकी ठोस वजह लिखित में दर्ज करनी होगी। नियमों में साफ कहा गया है कि इससे पारदर्शिता बनी रहेगी और मनमाने ढंग से फैसले पलटने की गुंजाइश कम होगी।
चंद्रपुर बैंक भर्ती विवाद से शुरू हुई थी पूरी कहानी
अब जरा इस पूरे मामले की जड़ में चलते हैं, क्योंकि यहीं पर आता है इस खबर का असली ट्विस्ट। साल 2022 में महाराष्ट्र के तत्कालीन सहकारिता मंत्री, जो बीजेपी से थे, उन्होंने चंद्रपुर जिला सहकारी बैंक में कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया को मंजूरी दे दी थी। उस वक्त के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को यह फैसला सही नहीं लगा और उन्होंने बीच में दखल देते हुए सहकारिता मंत्री के आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी।
इस कदम को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि जब विभागीय मंत्री ने कानूनी तौर पर फैसला ले ही लिया है, तो मुख्यमंत्री उसे इस तरह रोक नहीं सकते।
हाईकोर्ट ने पलटा मुख्यमंत्री का आदेश
मामले की सुनवाई के बाद 3 मार्च 2023 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शिंदे के उस रोक वाले आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ-साफ कहा कि 1975 के सरकारी कामकाज के नियमों के तहत मुख्यमंत्री के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है, जिससे वे अपने ही कैबिनेट मंत्री के फैसले को बदल सकें। यह फैसला उस वक्त की सरकार के लिए बड़ा कानूनी झटका साबित हुआ था।
जानकार बताते हैं कि इसी हार के बाद से सरकार के भीतर यह जरूरत महसूस की जाने लगी थी कि कामकाज के नियमों में बदलाव किया जाए, ताकि आगे चलकर मुख्यमंत्री की शक्तियों को लेकर कानूनी उलझन न रहे। अब अगस्त 2026 में आए नए नियमों ने इसी कानूनी कमी को भर दिया है, ताकि मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास, और आगे आने वाले किसी भी मुख्यमंत्री के पास, मंत्रियों के फैसलों को पलटने का साफ और कानूनी अधिकार सुरक्षित रहे।
Maharashtra Government Rules: गठबंधन में तनाव की आशंका
इन नए नियमों का असर सिर्फ प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रहने वाला। महाराष्ट्र में इस वक्त बीजेपी, शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) और एनसीपी (अजीत पवार गुट) की गठबंधन सरकार चल रही है। ऐसे में मुख्यमंत्री को मिली इतनी बड़ी ताकत गठबंधन के भीतर सहयोगी दलों के बीच असहजता की वजह बन सकती है। किसी भी मंत्री के फैसले पर मुख्यमंत्री की सीधी पकड़ का मतलब है कि सहयोगी दलों के मंत्रियों की स्वायत्तता पर भी असर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो महाराष्ट्र सरकार ने एक पुरानी अदालती हार से सबक लेते हुए अपने कामकाज के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। इससे मुख्यमंत्री की कुर्सी पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या गठबंधन के सहयोगी दल इस बदलाव को सहजता से स्वीकार करेंगे। आने वाले दिनों में मंत्रियों और सहयोगी दलों की प्रतिक्रिया इस पूरे मसले की दिशा तय करेगी। मामले की आगे की जानकारी अभी आनी बाकी है, ऐसे में अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि गठबंधन में इसका असर कितना गहरा होता है।
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