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Jharkhand News: झारखंड में पुल ढहने पर एसीबी और विभाग आमने सामने, एक तरफ क्लीन चिट, दूसरी तरफ कार्रवाई की लंबी फेहरिस्त

Jharkhand News: झारखंड में करोड़ों की लागत से बने पुलों का गिरना अब एक गंभीर सवाल बन गया है। एक तरफ राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) अपनी जांच में किसी को दोषी नहीं मानती, तो दूसरी तरफ विभाग खुद अपनी ही खामियों को स्वीकार कर रहा है। हाल ही में ग्रामीण अभियंत्रण विभाग ने हाईकोर्ट में शपथपत्र दाखिल कर यह माना कि राज्य के चार जिलों में नौ पुलों के निर्माण में भारी गड़बड़ी हुई है। एक तरफ फाइलों में एसीबी ने सब कुछ ठीक होने का दावा किया, वहीं विभाग ने उन पुलों के निर्माण में शामिल कई इंजीनियरों पर गाज गिराई और ठेकेदारों को काली सूची में डाला।

Jharkhand News: क्या एसीबी और विभाग की जांच में है बड़ा विरोधाभास?

जब राज्य में पुल ढहने के मामले सामने आए, तो जांच का जिम्मा एसीबी को सौंपा गया। एसीबी ने धनबाद समेत कई जिलों के क्षतिग्रस्त पुलों की जांच की। लेकिन एसीबी की फाइनल रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया। एजेंसी ने कोर्ट में कहा कि उन्हें जांच में कोई भी दोषी नहीं मिला और जो भी तकनीकी कमी दिखी, वह सिर्फ तथ्यों की भूल थी। यह रिपोर्ट उस समय के हालात पर बड़ा सवाल उठाती है, जब विभाग ने इसी दौरान अपनी आंतरिक जांच में न केवल गड़बड़ियों को स्वीकारा, बल्कि उन पर कार्रवाई भी शुरू कर दी।

यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब हम धनबाद के बराकर नदी वाले मामले को देखते हैं। साल 2009 में पुल ढह गया और 2010 में जांच एसीबी के पास गई। एसीबी ने 2017 में सारे आरोपों को खारिज कर दिया, जबकि विभागीय जांच में वही गड़बड़ी पकड़ी गई और ठेकेदार गणेश राम डोकानिया को 10 साल के लिए काली सूची में डाल दिया गया। यह स्पष्ट करता है कि सरकारी तंत्र के भीतर ही जांच के स्तर को लेकर भारी अंतर है।

चार जिलों के नौ पुलों में मिली बड़ी खामियां

हाईकोर्ट में दाखिल शपथपत्र में विभाग के सचिव मनोज कुमार ने विस्तार से बताया है कि राज्य में निर्माण कार्यों की हकीकत क्या है। विभाग ने स्वीकार किया है कि धनबाद, खूंटी, पलामू और गुमला जिले में करीब 55.90 करोड़ की लागत से बने नौ पुलों में त्रुटियां थीं।

पलामू के कोयल नदी पुल के मामले में 2012 में कंपनी पर प्राथमिकी दर्ज हुई थी, जिसे बाद में तकनीकी पेचीदगियों के कारण हटाना पड़ा। खूंटी में ताजना नदी पर बने पुल की गुणवत्ता इतनी खराब थी कि ठेकेदार से उसे दोबारा बनवाना पड़ा। गुमला में तो छह पुलों के निर्माण में 20 इंजीनियरों को दोषी माना गया था। हालांकि, बाद में कानूनी प्रक्रियाओं और अदालती आदेशों के कारण कई बार इन कार्रवाइयों का असर कम हो गया।

इंजीनियरों पर कार्रवाई और ठेकेदारों पर दबाव

विभाग ने धनबाद के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए छह अभियंताओं पर निलंबन से लेकर वेतन वृद्धि रोकने तक की कार्रवाई की है। इसमें कार्यपालक अभियंता से लेकर कनिष्ठ अभियंता तक शामिल हैं। निलंबन और पदोन्नति पर रोक जैसी ये कार्रवाइयां यह बताती हैं कि विभाग के पास सूचनाएं थीं, लेकिन क्या वह उन पर पूरी तरह से अमल कर पाया? यह बड़ा सवाल है।

वहीं ठेकेदारों की बात करें तो, विभाग ने अपनी तरफ से काली सूची में डालने और सिक्योरिटी जब्त करने जैसे कदम उठाए हैं। लेकिन अक्सर देखा गया है कि कानूनी दांवपेच या अदालती आदेशों के बाद ये ठेकेदार फिर से काम में शामिल हो जाते हैं। पलामू में कालसी बिल्डकॉन के मामले में यही देखने को मिला, जहां कंपनी को पहले ब्लैकलिस्ट किया गया, फिर 2016 में अदालत के आदेश पर वह प्रतिबंध खत्म करना पड़ा।

Jharkhand News: अदालत का कड़ा रुख और प्रशासनिक सुस्ती

इस मामले में पंकज कुमार यादव ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। कोर्ट ने बार-बार विभाग से जवाब मांगा, जिसके लिए विभाग को 10 हजार रुपये का जुर्माना भी भरना पड़ा। कोर्ट का यह रुख साफ करता है कि जनता के पैसे से बने ढांचों की सुरक्षा के प्रति सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए। जब करोड़ों का पुल ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है, तो सवाल केवल निर्माण सामग्री का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का होता है जो निर्माण के दौरान निगरानी करती है।

प्रशासनिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि जब सरकारी इंजीनियर खुद अपनी ही जांच में पकड़े जाते हैं, तो फिर एजेंसी की जांच क्लीन चिट कैसे दे देती है? क्या यह तकनीकी जांच की कमी है या फिर कहीं न कहीं फाइलें दबाने की कोशिश होती है? जनता की गाढ़ी कमाई से बना इंफ्रास्ट्रक्चर जब असुरक्षित हो, तो इसका सीधा असर आम लोगों के आवागमन और व्यापार पर पड़ता है।

Jharkhand News: आगे क्या हो सकता है?

अब इस मामले में सबकी नजरें हाईकोर्ट पर टिकी हैं। चूंकि विभाग ने शपथपत्र के माध्यम से खामियां स्वीकार कर ली हैं, इसलिए अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कोर्ट इन कार्रवाइयों को पर्याप्त मानता है। साथ ही, भविष्य में ऐसे मामलों से बचने के लिए क्या सरकार कोई नई नीति लाएगी?

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में कनेक्टिविटी के लिए ये पुल जीवनरेखा के समान हैं। यदि निर्माण में गड़बड़ी होगी और उस पर समय पर कार्रवाई नहीं होगी, तो आम नागरिक का भरोसा सिस्टम से उठना लाजमी है। फिलहाल, विभाग की ओर से दी गई जानकारी और एसीबी की रिपोर्ट के बीच का यह फासला राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही लड़ाई को और पेचीदा बनाता है। पारदर्शिता और जवाबदेही ही एकमात्र रास्ता है जिससे झारखंड की जनता के भरोसे को फिर से जीता जा सकता है।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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