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Women Mental Health: शादी के बाद “गुड न्यूज” वाले सवाल कैसे छीन रहे महिलाओं का मानसिक सुकून

Women Mental Health: शादी के कुछ महीनों बाद ही रिश्तेदारों और परिचितों की तरफ से शुरू हो जाने वाला एक सवाल लगभग हर महिला ने कभी न कभी सुना होगा, गुड न्यूज कब सुना रही हो। पूछने वालों के लिए यह भले ही एक सामान्य और औपचारिक सवाल हो, लेकिन जिन महिलाओं से यह बार-बार पूछा जाता है, उनकी मानसिक सेहत पर इसका असर कहीं गहरा होता है। कंसीव करने से जुड़े ऐसे बार-बार दोहराए जाने वाले सवाल महिलाओं में एंग्जायटी, अपराधबोध और आत्म-मूल्यांकन की समस्या को जन्म दे सकते हैं। शादी के तुरंत बाद से शुरू होने वाला यह सामाजिक दबाव धीरे-धीरे महिलाओं की मेंटल हेल्थ पर स्थायी असर छोड़ सकता है।

Women Mental Health: बार-बार पूछे जाने वाले सवालों की सामाजिक सच्चाई

भारतीय समाज में शादी के बाद महिलाओं से गुड न्यूज को लेकर सवाल पूछना लगभग एक सामान्य परंपरा जैसा बन चुका है। रिश्तेदार हों, पड़ोसी हों या फिर परिचित, हर कोई किसी न किसी मौके पर यह सवाल पूछ ही लेता है। शुरुआत में यह सवाल हल्का-फुल्का लग सकता है, लेकिन जैसे-जैसे शादी को समय बीतता जाता है, यही सवाल दबाव और चिंता का रूप लेने लगता है। खासतौर पर उन महिलाओं के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल हो जाती है, जो किसी वजह से बेबी प्लानिंग में देरी कर रही होती हैं या स्वास्थ्य संबंधी कारणों से कंसीव नहीं कर पा रही होतीं।

एंग्जायटी और गिल्ट का बढ़ता खतरा

डॉक्टर के अनुसार, जब महिलाओं को बार-बार इस तरह के सवालों का सामना करना पड़ता है, तो उनके मन में अनजाने में ही कंसीव करने को लेकर एक अदृश्य दबाव बनने लगता है। यह दबाव धीरे-धीरे एंग्जायटी और गिल्ट के रूप में सामने आता है। कई महिलाएं इस स्थिति में खुद को दोषी महसूस करने लगती हैं, भले ही इसमें उनकी कोई गलती न हो। यह मानसिक स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो रोजमर्रा की जिंदगी और रिश्तों पर भी इसका असर दिखने लगता है।

Women Mental Health: खुद को कमतर आंकने की भावना

कई बार लोग गुड न्यूज के सवाल के साथ-साथ यह उदाहरण भी दे देते हैं कि किस तरह उनकी उम्र की बाकी महिलाएं पहले ही मां बन चुकी हैं। ऐसी तुलना महिलाओं के आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुंचाती है। धीरे-धीरे उनके मन में यह भावना घर करने लगती है कि कंसीव न कर पाने के पीछे उनमें कोई कमी है, जबकि हकीकत में इसके पीछे शारीरिक, मानसिक या परिस्थितिजन्य कई कारण हो सकते हैं। यह आत्म-मूल्यांकन की प्रक्रिया लंबे समय में उनके आत्मसम्मान को प्रभावित करती है।

अकेलेपन का एहसास और सामाजिक दबाव

कुछ दंपती पेशेवर कारणों या आपसी सहमति से बेबी प्लानिंग में देरी करते हैं, जबकि कुछ मामलों में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी इसकी वजह बनती हैं। ऐसी स्थिति में जब आसपास के लोग लगातार सवाल पूछते रहते हैं, तो महिलाओं को गहरा अकेलापन महसूस होने लगता है। उन्हें लगता है कि उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा फैसला भी समाज की जांच-परख का विषय बन गया है, जिससे वे खुद को भावनात्मक रूप से अलग-थलग महसूस करने लगती हैं।

Women Mental Health: स्ट्रेस हार्मोन और शारीरिक असर

मानसिक दबाव का असर सिर्फ भावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर पर भी सीधा प्रभाव डालता है। डॉक्टर माधवी बताती हैं कि जब इस तरह के सवाल लगातार पूछे जाते हैं, तो महिलाओं के शरीर में स्ट्रेस लेवल बढ़ने लगता है, जिससे कोर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन का स्तर भी ऊपर चला जाता है। यह हार्मोनल असंतुलन कई बार कंसीव करने की प्राकृतिक प्रक्रिया को और मुश्किल बना देता है। यानी जो सवाल गुड न्यूज पाने की उम्मीद में पूछे जाते हैं, वे कहीं न कहीं उसी प्रक्रिया में रुकावट पैदा करने का काम भी कर सकते हैं।

समाज में गुड न्यूज को लेकर पूछे जाने वाले सवाल भले ही अच्छी भावना से पूछे जाते हों, लेकिन इनका असर महिलाओं की मानसिक सेहत पर काफी गहरा पड़ता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक बार-बार का यह दबाव एंग्जायटी, आत्म-संदेह और अकेलेपन जैसी स्थितियों को जन्म दे सकता है, जो आगे चलकर हार्मोनल असंतुलन का कारण भी बन सकता है। ऐसे में परिवार और समाज दोनों को इस विषय पर संवेदनशीलता बरतने की जरूरत है। बेबी प्लानिंग पूरी तरह दंपती का निजी फैसला होता है, और इसे लेकर बार-बार सवाल करने की बजाय भावनात्मक सहयोग देना कहीं ज्यादा जरूरी है।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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