Malmas 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार 17 मई 2026 से मलमास की शुरुआत हो चुकी है जिसके बाद से ही देश भर में विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह रोक लग गई है। इस विशेष अवधि को लेकर आम लोगों के बीच यह गहरा भ्रम बना रहता है कि यह महीना अपवित्र या मलिन होता है, जिस वजह से इसमें नए काम करना वर्जित माना जाता है। ज्योतिष विज्ञान और पौराणिक ग्रंथों के नियमों को खंगालने पर इस महीने के पीछे छिपे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तथ्य बिल्कुल अलग नजर आते हैं।
पंचांग की गणनाओं के आधार पर भारतीय समाज में समय-समय पर आने वाले इस अतिरिक्त महीने को लेकर कई तरह की लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। बनारस, मथुरा और उज्जैन जैसे प्रमुख धार्मिक केंद्रों के ज्योतिषियों और कर्मकांड के विद्वानों के पास इन दिनों श्रद्धालुओं के लगातार ऐसे फोन आ रहे हैं जिनमें लोग इस महीने में नए कपड़े खरीदने, गाड़ी बुक करने या संपत्ति का सौदा करने को लेकर संशय जता रहे हैं। कुछ परिवारों में तो इस दौरान रोजमर्रा की खरीदारी तक को टालने का चलन देखा जाता है। इस कूटनीतिक उलझन को दूर करने के लिए जब हम सनातन खगोल विज्ञान की गहराई में जाते हैं, तो पता चलता है कि यह महीना अपवित्रता का नहीं बल्कि समय की गणना को शुद्ध करने का एक बेहद पवित्र कालखंड है।
Malmas 2026: क्या मलमास का वास्तविक अर्थ मलिन या गंदगी से जुड़ा हुआ है
वैदिक ज्योतिष और पंचांग निर्माताओं के मुताबिक आम जनमानस में ‘मल’ शब्द को लेकर जो धारणा बन गई है, वह पूरी तरह भ्रामक है। खगोलीय गणना के नियमों के अनुसार यहां मल का तात्पर्य किसी भी प्रकार की गंदगी या अपवित्रता से नहीं, बल्कि ‘अभाव’ से है। भारत की पारंपरिक कालगणना में दो मुख्य प्रणालियों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें सौर वर्ष और चंद्र वर्ष कहा जाता है। सूर्य की गति पर आधारित सौर वर्ष में कुल 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकंड होते हैं, जिसे सामान्य तौर पर 365 दिन माना जाता है। दूसरी तरफ चंद्रमा की कलाओं पर आधारित चंद्र वर्ष में केवल 354 दिन ही होते हैं।
इस गणितीय व्यवस्था के कारण सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का एक बड़ा अंतर पैदा हो जाता है। यदि इस अंतर को ऐसे ही छोड़ दिया जाए, तो तीन साल में यह अंतर लगभग एक महीने का हो जाएगा, जिससे हमारे सारे मौसम और त्योहारों का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा। इसी अंतर को पाटने और पंचांग को ऋतुओं के अनुकूल बनाए रखने के लिए हर तीसरे साल चंद्र वर्ष में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, जिसे खगोलीय भाषा में अधिकमास कहा जाता है। चूंकि इस पूरे महीने के दौरान सूर्य किसी भी नई राशि में प्रवेश नहीं करता यानी इसमें कोई सूर्य संक्रांति नहीं होती, इसीलिए संक्रांति का ‘मल’ यानी अभाव होने के कारण इसे लोक भाषा में मलमास कहा जाने लगा। यह पूरी प्रक्रिया ब्रह्मांडीय कैलेंडर को शुद्ध करने का एक वैज्ञानिक तरीका है।
अगर यह महीना अशुभ नहीं है तो मांगलिक कार्यों पर क्यों लगती है रोक
सनातन परंपरा में किसी भी सांसारिक या भौतिक शुभ कार्य जैसे शादी-ब्याह, यज्ञोपवीत या नए घर के निर्माण के लिए ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा और ग्रहों की शुभ स्थिति का होना अनिवार्य माना गया है। ज्योतिषीय सिद्धांतों के अनुसार इन सभी सांसारिक कार्यों को फलीभूत करने और सफलता दिलाने की मुख्य जिम्मेदारी सूर्य देव और गुरु बृहस्पति के पास होती है। जब तक सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में गोचर यानी संक्रांति नहीं करता, तब तक प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार नहीं होता।
मलमास के दौरान सूर्य की कोई संक्रांति न होने की वजह से इस पूरे महीने में सांसारिक कार्यों को आगे बढ़ाने वाली भौतिक ऊर्जा का अभाव रहता है। सरल शब्दों में कहें तो इस समय प्रकृति विश्राम की अवस्था में होती है। यही कारण है कि इस अवधि में भौतिक सुख-सुविधाओं से जुड़े कार्यों को करने की मनाही की गई है क्योंकि इस समय किए गए कार्यों को ग्रहों का आवश्यक बल नहीं मिल पाता। हालांकि इसके विपरीत, यही ऊर्जा विहीनता आध्यात्मिक कार्यों के लिए सबसे उत्तम मानी गई है क्योंकि इस दौरान सांसारिक भटकाव कम होता है और मनुष्य का ध्यान ईश्वर की ओर अधिक आसानी से केंद्रित हो पाता है।
भगवान विष्णु ने इस महीने को अपना नाम पुरुषोत्तम मास क्यों दिया
पौराणिक कथाओं और धार्मिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस महीने के साथ एक बेहद भावुक और कूटनीतिक प्रसंग जुड़ा हुआ है। शास्त्रों के अनुसार जब सौर और चंद्र वर्ष के तालमेल के लिए इस अतिरिक्त महीने का निर्माण हुआ, तब इसके पास अपना कोई स्वामी ग्रह नहीं था और इसमें संक्रांति न होने के कारण इसे समाज में ‘मलमास’ कहकर इसका उपहास उड़ाया जाने लगा। इस उपेक्षा से दुखी होकर यह महीना साक्षात भगवान विष्णु के पास वैकुंठ धाम पहुंचा और अपनी व्यथा सुनाई।
भगवान विष्णु ने इस महीने की पीड़ा को समझते हुए उसे न केवल अपना आशीर्वाद दिया, बल्कि अपना सबसे उत्तम नाम ‘पुरुषोत्तम’ भी प्रदान किया। श्रीहरि ने घोषणा की कि अब से वह स्वयं इस महीने के स्वामी होंगे और इस अवधि में जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा के साथ जप, तप, दान और नारायण की पूजा करेगा, उसे वर्ष के अन्य महीनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होगा। इसी वजह से इस महीने को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और देश के तमाम वैष्णव तीर्थों में इस दौरान विशेष पूजा-अर्चना और भागवत कथा के पाठ आयोजित किए जाते हैं।
इस दौरान कौन से कार्य करने चाहिए और किन चीजों से बचना चाहिए
चूंकि यह महीना पूरी तरह से भगवान पुरुषोत्तम को समर्पित है, इसलिए इसमें सांसारिक ऐश्वर्य के कार्यों को छोड़कर आत्मिक शुद्धि के प्रयास करने का विधान है। इस महीने में पवित्र नदियों में स्नान करने, अपनी क्षमता के अनुसार गरीबों को अन्न व वस्त्र दान करने और गायत्री मंत्र या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दौरान सात्विक जीवन शैली अपनाना और मानसिक शांति बनाए रखना सबसे उत्तम माना जाता है।
इसके विपरीत, नए व्यापार की शुरुआत करना, सगाई या विवाह के बंधन में बंधना, नए मकान की नींव रखना या उसमें प्रवेश करना जैसे कार्यों को अगले महीने तक के लिए टाल देना चाहिए। यह समझना बेहद जरूरी है कि इन कार्यों को न करने के पीछे का कारण कोई अशुभ भय नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों के प्रति सम्मान प्रकट करना है। जैसे हम रात के समय सोने और दिन में काम करने का नियम अपनाते हैं, ठीक वैसे ही मलमास प्रकृति का एक विश्राम काल है जिसमें हमें शांत रहकर केवल अपनी आंतरिक ऊर्जा को मजबूत करना होता है।
Malmas 2026: आधुनिक पीढ़ी और खगोलीय गणनाओं का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आज की आधुनिक और पढ़ी-लिखी पीढ़ी जब मलमास जैसी अवधारणाओं को केवल एक पुरानी अंधश्रद्धा मानकर खारिज करने की कोशिश करती है, तब पंचांग का यह गणित उन्हें अचंभित कर देता है। दुनिया के कई अन्य प्राचीन कैलेंडर जहां समय के साथ मौसमों से पीछे छूट गए, वहीं भारतीय पंचांग आज भी हजारों साल बाद सूर्य और चंद्रमा की सटीक स्थिति को दर्शाता है। मलमास वास्तव में लीप ईयर की तरह ही काम करता है, बस अंतर यह है कि जहां अंग्रेजी कैलेंडर में हर चार साल में एक दिन जोड़ा जाता है, वहीं हिंदू पंचांग में हर तीन साल में एक पूरा महीना जोड़कर गणना को पूरी तरह सटीक रखा जाता है।
देश के बड़े विश्वविद्यालयों के खगोल विज्ञान के प्रोफेसरों का भी मानना है कि हमारे पूर्वजों ने बिना किसी आधुनिक दूरबीन के सूर्य और चंद्रमा की गतियों का जो सटीक हिसाब लगाया था, वह उनकी अद्भुत वैज्ञानिक सोच को प्रदर्शित करता है। इसलिए इस महीने को किसी रूढ़िवादिता या अपवित्रता के चश्मे से देखने के बजाय इसके पीछे छिपे महान खगोलीय विज्ञान को समझने की आवश्यकता है, जो हमें प्रकृति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना सिखाता है।
Read More Here:-
- SSC CGL Notification 2026: एसएससी सीजीएल 2026 का नोटिफिकेशन जारी 12256 पदों पर बंपर भर्ती के लिए आवेदन शुरू
- Deoria Development Projects: सीएम योगी ने देवरिया में 655 करोड़ की परियोजनाओं का किया शिलान्यास और लोकार्पण
- Rajya Sabha Election: देश की 24 सीटों पर चुनाव का ऐलान, 18 जून को होगी वोटिंग, झारखंड में भी बढ़ी सियासी हलचल
- Pramod Premi Yadav New Song: प्रमोद प्रेमी यादव का नया भोजपुरी गाना ‘जनुआ तोहार जीती’ हुआ रिलीज, ‘झांझरिया’ की धुन ने मचाया तहलका


