Pending Court Cases In India: देश की न्याय व्यवस्था में वर्षों से लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे आम जनता को समय पर न्याय मिलने की उम्मीदों को करारा झटका लग रहा है। सरकार की ओर से संसद में पेश किए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट में दस हजार से अधिक मामले पिछले दस सालों से लंबित पड़े हैं। इसके अलावा देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों यानी हाई कोर्टों में अस्सी हजार से ज्यादा ऐसे मामले हैं जो पिछले तीन दशकों से न्याय का इंतजार कर रहे हैं।
वर्ष 2011 से लेकर अब तक अदालतों के बुनियादी ढांचे और तकनीकी सुधारों पर नौ हजार आठ सौ करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च की जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद मुकदमों के निस्तारण की गति में कोई खास सुधार देखने को नहीं मिला है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में लिखित जवाब देते हुए इन लंबित मामलों की पूरी जिम्मेदारी न्यायपालिका के पाले में डाल दी है और मामलों के निपटारे के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय न होने को इसकी मुख्य वजह बताया है।
अदालतों में मुकदमों की इस लंबी कतार के पीछे कई तरह के प्रशासनिक और व्यावहारिक कारण छिपे हुए हैं, जिन पर लंबे समय से बहस चल रही है। एक तरफ जहां सरकार आधारभूत संरचनाओं को मजबूत करने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ अदालतों में खाली पड़े जजों के पद इस समस्या को और अधिक गंभीर बना देते हैं। निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायपालिका तक जजों की भारी कमी के कारण मुकदमों की सुनवाई बार-बार टलती रहती है, जिससे मुकदमों का अंबार लगातार बड़ा होता जाता है।
इस स्थिति ने एक बार फिर से देश की न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली और मुकदमों के त्वरित निस्तारण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि सरकार और न्यायपालिका के बीच इस पूरे मामले पर क्या रुख है और अदालतों की जमीनी हकीकत क्या बयां करती है।
Pending Court Cases In India: बुनियादी ढांचे पर भारी भरकम खर्च के बाद भी हालात जस के तस
पिछले डेढ़ दशक के दौरान देश भर की अदालतों की सूरत बदलने के लिए सरकार ने अरबों रुपये का बजट आवंटित किया है। अदालतों की इमारतों को आधुनिक बनाने, तकनीकी सुविधाओं को जोड़ने और डिजिटल कोर्ट की परिकल्पना को साकार करने के लिए नौ हजार आठ सौ करोड़ रुपये से अधिक की राशि पानी की तरह बहाई गई है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आ रहा है, और मुकदमों के पेंडिंग रहने का सिलसिला लगातार जारी है। सुप्रीम कोर्ट के भीतर वर्तमान स्थिति यह है कि दस हजार से ज्यादा मामले दस साल से अधिक समय से न्याय की आस में धूल फांक रहे हैं। इन पुराने मामलों में से सैकड़ों ऐसे केस हैं जिन्हें चलते हुए बीस साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, और कुछ मामले तो ऐसे भी हैं जो तीस साल से न्यायपालिका के चक्कर काट रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल भवनों के निर्माण और तकनीक के इस्तेमाल से न्याय प्रणाली की रफ्तार तेज नहीं हो सकती, जब तक कि इसके आंतरिक कामकाज और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार न किया जाए। अदालतों में मुकदमों के लंबे खिंचने से न केवल याचिकाकर्ताओं का धन और समय बर्बाद होता है, बल्कि न्याय व्यवस्था से उनका भरोसा भी डगमगाने लगता है। इतनी बड़ी धनराशि खर्च होने के बावजूद मुकदमों के अंबार का कम न होना नीति निर्माताओं और न्यायिक अधिकारियों दोनों के लिए एक बड़ा और गंभीर विचारणीय विषय बन चुका है। जनता के टैक्स के पैसों का सही उपयोग तभी माना जा सकता है जब उसका सीधा लाभ आम आदमी को त्वरित न्याय के रूप में मिले।
अदालतों में जजों के खाली पद और नियुक्तियों की लंबी प्रक्रिया
न्यायपालिका में बढ़ते मुकदमों के बोझ के पीछे एक बहुत बड़ा कारण जजों और न्यायिक अधिकारियों के भारी संख्या में रिक्त पड़े पद हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर भले ही जजों की नियुक्तियों को लेकर तेजी दिखाई जाती रही हो, लेकिन देश के पच्चीस उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों की तस्वीर बेहद निराशाजनक है। देश के विभिन्न हाई कोर्टों में जजों के कुल स्वीकृत पदों की संख्या एक हजार एक सौ बाइस है, जिनमें से वर्तमान में तीन सौ इकतालीस पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा निचली अदालतों की हालत तो और भी ज्यादा चिंताजनक है जहां तीस हजार से अधिक स्वीकृत पदों में से सात हजार से ज्यादा सीटें लंबे समय से रिक्त चल रही हैं। जजों की इस भारी कमी के कारण एक-एक न्यायाधीश के ऊपर मुकदमों का इतना अधिक दबाव आ जाता है कि वे चाहकर भी मामलों का जल्दी फैसला नहीं कर पाते हैं।
केंद्रीय कानून मंत्री ने संसद में जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि हाई कोर्टों में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने के लिए समय-सीमा का पालन न किया जाना इस समस्या का एक बड़ा कारण है। उन्होंने इसके लिए संबंधित उच्च न्यायालयों के कॉलेजियम तंत्र को जिम्मेदार ठहराया है जो समय पर योग्य वकीलों और जजों के नामों की सिफारिश नहीं करते हैं। जब तक कॉलेजियम प्रणाली और सरकार के बीच समन्वय बेहतर नहीं होगा और खाली पदों को मिशन मोड में नहीं भरा जाएगा, तब तक मुकदमों के निपटारे की गति में सुधार होना नामुमकिन सा लगता है। न्यायिक नियुक्तियों की इस धीमी प्रक्रिया ने पूरे सिस्टम को जकड़ रखा है, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर न्याय मांगने वाले आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
Pending Court Cases In India: सरकार के प्रयास और लंबित मामलों को कम करने की रणनीतियां
बढ़ते मुकदमों के इस संकट से निपटने के लिए सरकार और न्यायपालिका के स्तर पर समय-समय पर कई तरह के कदम उठाए गए हैं। देश के सभी पच्चीस उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों की पहचान करने और उन्हें निपटाने के लिए विशेष एरियर कमेटियों का गठन किया गया है। इसके अलावा न्याय प्रणाली में सुधार लाने के उद्देश्य से देश में नए आपराधिक कानून 2023 के साथ-साथ कई अन्य संशोधन अधिनियम भी लागू किए गए हैं। इन तमाम कानूनी सुधारों का मुख्य मकसद यह था कि अदालतों की प्रक्रिया को थोड़ा सुगम बनाया जा सके और अनावश्यक कागजी कार्रवाई तथा तारीखों के खेल को कम किया जा सके।
हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि केवल कानून बना देने मात्र से अदालतों की कार्यकुशलता में रातोंरात सुधार नहीं आ सकता जब तक कि उनकी मैदानी अमलीजामा पहनाने की इच्छाशक्ति मजबूत न हो। जांच एजेंसियों, वकीलों के संगठनों, गवाहों और मुकदमेबाजी करने वाले पक्षों का आपसी सहयोग भी मुकदमों के समय पर फैसले के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि अदालत का आदेश। मामलों के तथ्यों की जटिलता और साक्ष्यों की प्रकृति भी कई बार न्याय प्रक्रिया को लंबा खींचने में उत्प्रेरक का काम करती है। सरकार की तरफ से उठाए गए ये कदम कागजों पर तो काफी असरदार दिखाई देते हैं, लेकिन इनका वास्तविक प्रभाव अदालतों के फर्श पर अभी पूरी तरह से उतरना बाकी है।
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