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बंगाल चुनाव से पहले हुमायूं-ओवैसी का गठबंधन, मुस्लिम वोट बैंक पर सबकी नजर, तृणमूल-कांग्रेस की बढ़ी टेंशन

Bengal election 2026: तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर की पार्टी एजेयूपी और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने बुधवार को कोलकाता में संयुक्त प्रेस वार्ता कर बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपने गठबंधन की औपचारिक घोषणा कर दी। इस ऐलान के बाद बंगाल की सियासत में हलचल मच गई है और मुस्लिम वोटों को लेकर कई दलों में होड़ शुरू हो गई है।

क्या है यह गठबंधन और कब हुई घोषणा?

बुधवार को कोलकाता में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम ने आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए साथ मिलकर लड़ने का ऐलान किया। इस गठबंधन के तहत एजेयूपी 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। एआईएमआईएम को कितनी सीटें दी जाएंगी, इस पर बातचीत हो चुकी है लेकिन अभी इसका सार्वजनिक खुलासा नहीं किया गया है।

हुमायूं कबीर पहले तृणमूल कांग्रेस के विधायक थे लेकिन पार्टी से निलंबन के बाद उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली। उन्होंने मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की नींव रखकर पहले ही एक बड़ा सियासी संदेश दे दिया था। अब ओवैसी के साथ उनका गठबंधन बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया है।

Bengal election 2026:ओवैसी और हुमायूं ने क्या कहा?

प्रेस कॉन्फ्रेंस में असदुद्दीन ओवैसी ने तृणमूल कांग्रेस पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि तृणमूल ने मुस्लिम वोट तो हासिल किए लेकिन इस समुदाय के लिए जमीन पर कुछ खास नहीं किया। ओवैसी ने यह भी कहा कि उनका गठबंधन मुख्यमंत्री पद के लिए भी चुनाव लड़ेगा।

हुमायूं कबीर ने भी साफ शब्दों में कहा कि बंगाल को एक मुस्लिम मुख्यमंत्री की जरूरत है। उनका यह बयान सीधे तौर पर ममता बनर्जी को चुनौती देता है जो खुद को मुस्लिम समुदाय की सबसे बड़ी हिमायती बताती आई हैं। इस बयान ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है और कई दलों की नींद उड़ा दी है।

तृणमूल की मुश्किलें क्यों बढ़ीं?

Bengal Election 2026
Bengal Election 2026

तृणमूल कांग्रेस को पिछले डेढ़ दशक से बंगाल के मुस्लिम वोटरों का भरपूर साथ मिलता रहा है। ममता बनर्जी ने हमेशा से मुस्लिम समुदाय के साथ करीबी रिश्ता बनाए रखा है। इस बार भी तृणमूल ने 47 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जो पिछले चुनाव से पांच ज्यादा हैं। यह साफ दिखाता है कि ममता मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहीं।

लेकिन हुमायूं-ओवैसी की जोड़ी के सामने आने के बाद तृणमूल के लिए यह काम पहले जितना आसान नहीं रह गया है। ओवैसी का मुस्लिम वोटरों पर खासा असर है और हुमायूं का बंगाल में अपना एक आधार है। दोनों मिलकर तृणमूल के परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी कर सकते हैं।

बंगाल में मुस्लिम वोटरों की ताकत कितनी है?

बंगाल विधानसभा चुनाव की राजनीति में मुस्लिम वोटरों की भूमिका बेहद अहम है। राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से करीब 100 से 110 सीटों पर मुस्लिम मतदाता चुनाव के नतीजे तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

राज्य की कुल आबादी अभी 10 करोड़ से ज्यादा है जिसमें करीब 30 प्रतिशत यानी लगभग 3 करोड़ मुस्लिम हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है। इन इलाकों में जो पार्टी मुस्लिम वोट हासिल करती है वह सत्ता की दौड़ में काफी आगे निकल जाती है। यही कारण है कि इस गठबंधन की घोषणा के बाद हर पार्टी अपना गणित नए सिरे से बिठाने में लगी हुई है।

ओवैसी का असर कहां ज्यादा दिख सकता है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का असर बंगाल के उन इलाकों में ज्यादा देखने को मिल सकता है जो बिहार के सीमांचल क्षेत्र से सटे हैं। पूर्णिया, अररिया, कटिहार और किशनगंज जैसे बिहार के जिलों से लगते बंगाल के उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर के मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में ओवैसी की पकड़ बन सकती है।

यह इसलिए भी संभव है क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीती थीं और उस इलाके में उनका काफी प्रभाव है। सीमांचल से सटे बंगाल के इलाकों में भी वैसी ही सामाजिक और धार्मिक बनावट है इसलिए ओवैसी यहां अपना असर दिखा सकते हैं।

कांग्रेस और वाम मोर्चे की भी बढ़ी चिंता

इस गठबंधन की मार सिर्फ तृणमूल पर नहीं पड़ेगी। कांग्रेस और वाम मोर्चा भी अपना खोया हुआ मुस्लिम वोट वापस पाने की कोशिश में लगे हैं। कभी बंगाल में वाम मोर्चे को मुस्लिम वोटरों का अच्छा समर्थन मिलता था लेकिन धीरे-धीरे यह वोट तृणमूल की तरफ खिसकता चला गया।

अब जब हुमायूं-ओवैसी की जोड़ी मैदान में उतरी है तो मुस्लिम वोट और भी ज्यादा बिखर सकता है। इससे कांग्रेस और वाम मोर्चे की मुस्लिम वोट वापस पाने की उम्मीदों पर भी पानी फिर सकता है। नौशाद सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट भी इसी इलाके में अपना गणित लगा रही है जिससे मुस्लिम वोट और भी बंटता दिख रहा है।

भाजपा को मिल सकता है फायदा?

बंगाल की राजनीति में एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि इस गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा। कई जानकारों का मानना है कि अगर हुमायूं-ओवैसी का गठबंधन बड़ा उलटफेर न भी कर पाए तब भी मुस्लिम वोट बैंक में बंटवारे से भारतीय जनता पार्टी को फायदा हो सकता है।

जब मुस्लिम वोट कई दलों में बंट जाता है तो उन सीटों पर हिंदू वोट एकजुट रहने वाली पार्टी को लाभ मिलता है। ऐसे में भाजपा की नजर भी इस पूरे खेल पर टिकी हुई है। हालांकि ममता खुद इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं और इसीलिए वे मुस्लिम समुदाय को अपने साथ बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं।

आगे क्या होगा?

अभी चुनाव की तारीखों का ऐलान होना बाकी है लेकिन इस गठबंधन की घोषणा ने बंगाल की सियासत को पहले से ही गर्म कर दिया है। एआईएमआईएम को दी जाने वाली सीटों का खुलासा अभी बाकी है और जैसे-जैसे यह तस्वीर साफ होगी वैसे-वैसे दूसरी पार्टियां भी अपनी रणनीति बदलेंगी।

हुमायूं और ओवैसी का दावा है कि वे बंगाल के मुस्लिम समुदाय के हकों के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन तृणमूल, कांग्रेस और वाम मोर्चा यह मानने को तैयार नहीं कि यह गठबंधन उनके वोट बैंक में कोई बड़ी सेंध लगा पाएगा। बंगाल का मुस्लिम मतदाता किसके साथ जाता है यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे लेकिन इतना तय है कि इस बार की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा दिलचस्प और कड़ी होने वाली है।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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