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Iran-US Crisis: ईरान-अमेरिका तनाव का सीधा असर, अमृतसर में महंगे कच्चे माल ने रोकी मशरूम की खेती

Iran-US Crisis: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) मार्ग में पैदा हुई बाधाओं का सीधा असर अब पंजाब के कृषि क्षेत्र पर दिखने लगा है। अमृतसर जिले में इस वैश्विक तनाव के कारण मशरूम उद्योग गहरे संकट में घिर गया है। हर साल मई के महीने में बड़े पैमाने पर शुरू होने वाली मिल्की मशरूम की खेती इस बार ठप होने की कगार पर पहुंच गई है। खाद, कंपोस्ट, ईंधन और परिवहन लागत में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के कारण अधिकांश किसानों ने इस सीजन में मशरूम का उत्पादन शुरू ही नहीं किया है। स्थिति यह है कि अमृतसर के प्रमुख मशरूम उत्पादक क्षेत्रों में केवल 20 प्रतिशत किसानों ने ही इस बार खेती करने का जोखिम उठाया है। इसके चलते आने वाले दिनों में बाजारों में मशरूम की भारी किल्लत हो सकती है, जिससे इसकी कीमतों में 30 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होने की आशंका जताई जा रही है।

Iran-US Crisis: अंतरराष्ट्रीय संकट का स्थानीय स्तर पर असर

ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध के कारण होर्मुज मार्ग से होने वाली वैश्विक आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल और आपूर्ति श्रृंखला टूटने का असर भारत के स्थानीय उद्योगों तक पहुंच गया है। मशरूम उत्पादन के लिए आवश्यक नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों और रसायनों की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिससे कच्चे माल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसके अतिरिक्त, ईंधन के दाम बढ़ने से माल ढुलाई और स्थानीय परिवहन भी काफी महंगा हो गया है।

अमृतसर के प्रमुख मशरूम उत्पादक क्षेत्र प्रभावित

अमृतसर जिले को पंजाब में मशरूम उत्पादन का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां की जलवायु और मिट्टी मिल्की तथा बटन मशरूम की खेती के लिए बेहद अनुकूल है। लेकिन मौजूदा संकट के कारण जिले के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र पूरी तरह प्रभावित हुए हैं:

  • जंडियाला गुरु: इस क्षेत्र में कई बड़े और छोटे मशरूम उत्पादक यूनिट हैं, जहां लागत बढ़ने के कारण इस बार काम शुरू नहीं हो सका है।
  • मानांवाला: इस बेल्ट में उर्वरक और कंपोस्ट की सप्लाई पूरी तरह ठप हो गई है। विदेशी कंपनियों ने समय पर डिलीवरी देने से मना कर दिया है।
  • वेरका और अजनाला: इन क्षेत्रों में बिजली और डीजल की बढ़ती कीमतों के कारण छोटे किसानों ने इस बार मशरूम के प्लांट खाली छोड़ दिए हैं।

आंकड़ों के अनुसार, इन क्षेत्रों के लगभग 80 प्रतिशत किसानों ने नुकसान के डर से इस बार कंपोस्ट की बुकिंग ही नहीं की है।

उर्वरक और कंपोस्ट के दाम तीन गुना तक बढ़े

मशरूम की खेती में सबसे महत्वपूर्ण सामग्री कंपोस्ट और विशिष्ट उर्वरक होते हैं। स्थानीय उत्पादकों के अनुसार, पिछले कुछ सप्ताह के भीतर इनके दामों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।

अमृतसर के मशरूम उत्पादक जागीर सिंह ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और रसायनों की कीमतें बढ़ने से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के दाम तीन गुना बढ़ गए हैं। पहले किसानों को मशरूम उगाने के लिए जो एक ट्राली कंपोस्ट 12,000 रुपये से 15,000 रुपये में आसानी से मिल जाती थी, उसकी कीमत अब बढ़कर 35,000 रुपये से 40,000 रुपये तक पहुंच चुकी है। इतनी अधिक शुरुआती लागत लगाने के बाद फसल से मुनाफा कमाना छोटे और मध्यम स्तर के किसानों के लिए असंभव हो गया है।

नियंत्रित वातावरण और बिजली की बढ़ती लागत

मिल्की मशरूम की खेती पूरी तरह से एक नियंत्रित वातावरण (Controlled Environment) में की जाती है। इसके सफल उत्पादन के लिए कमरों के भीतर एक निश्चित तापमान, नमी (Humidity) और उच्च स्तर की साफ-सफाई बनाए रखनी होती है। इसके लिए प्लांट में लगातार बिजली की आवश्यकता होती है।

जंडियाला गुरु के एक अन्य उत्पादक सरबजीत सिंह ने बताया कि पंजाब में गर्मियों के दौरान तापमान को नियंत्रित रखने के लिए एयर कंडीशनिंग और वेंटिलेशन सिस्टम चौबीसों घंटे चलाने पड़ते हैं। बिजली कटौती के दौरान बैकअप के लिए डीजल जनरेटर का उपयोग किया जाता है। डीजल और बिजली की दरों में बढ़ोतरी के कारण उत्पादन का दैनिक खर्च बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इसके अलावा, मशरूम को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक पैकेजिंग सामग्री भी महंगी हो गई है, जिससे अंतिम उत्पाद तैयार होने तक लागत दोगुनी से अधिक हो जा रही है।

होर्मुज मार्ग में रुकावट से थमी सप्लाई चेन

मध्य पूर्व में होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार, विशेषकर कच्चे तेल और रासायनिक खादों के परिवहन के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस मार्ग पर जारी तनाव के कारण कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने भारत आने वाले माल के किरायों में भारी वृद्धि कर दी है। अमृतसर के मानांवाला क्षेत्र के किसानों ने बताया कि उर्वरक बनाने वाली कई प्रमुख कंपनियों ने कच्चे माल की कमी का हवाला देते हुए समय पर आपूर्ति करने में असमर्थता जताई है। जिन डीलरों के पास स्टॉक उपलब्ध भी है, उन्होंने सीधे तौर पर कीमतें बढ़ा दी हैं, जिसका पूरा बोझ अब गरीब किसानों पर पड़ रहा है।

अमृतसर में मशरूम उद्योग का महत्व

अमृतसर का मशरूम उद्योग केवल स्थानीय व्यापार तक सीमित नहीं है। यहां उत्पादित उच्च गुणवत्ता वाले मशरूम को पंजाब के विभिन्न हिस्सों, दिल्ली-एनसीआर और जम्मू-कश्मीर सहित देश के अन्य राज्यों और विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। इस क्षेत्र में मशरूम के महत्व को देखते हुए अमृतसर के ऐतिहासिक खालसा कॉलेज में मशरूम उत्पादन के लिए एक विशेष ‘एक वर्षीय डिप्लोमा कोर्स’ भी संचालित किया जा रहा है, ताकि युवाओं को इस क्षेत्र में रोजगार मिल सके। लेकिन मौजूदा संकट ने इस पूरे शैक्षणिक और व्यावसायिक ढांचे के सामने अनिश्चितता पैदा कर दी है।

बाजार में भारी मांग, लेकिन उत्पादन बेहद कम

पंजाब और आसपास के राज्यों में मशरूम की मांग लगातार बढ़ रही है। होटल इंडस्ट्री, बड़े रेस्टोरेंट, फास्ट फूड चेन और घरेलू रसोई में मशरूम का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। शाकाहारी (Vegetarian) आबादी के लिए मशरूम प्रोटीन और पोषण का एक बेहतरीन और पसंदीदा स्रोत माना जाता है। खासकर गर्मियों के मौसम में मिल्की और बटन मशरूम की मांग अपने चरम पर होती है।

इस साल बाजार में मांग तो सामान्य बनी हुई है, लेकिन उसके मुकाबले आपूर्ति बेहद कम रहने वाली है। कई बड़े उत्पादक यूनिट पूरी तरह बंद पड़े हैं, और जिन्होंने काम शुरू भी किया है, वे केवल सीमित मात्रा में ही उत्पादन कर रहे हैं ताकि यदि बाजार में सही दाम न मिले तो भारी आर्थिक नुकसान से बचा जा सके।

Iran-US Crisis: आम लोगों की थाली पर पड़ेगा सीधा असर

स्थानीय कृषि विशेषज्ञों और बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो आने वाले महीनों में मशरूम के दाम में 30 से 50 प्रतिशत तक की सीधी बढ़ोतरी देखी जा सकती है। थोक और खुदरा बाजारों में अभी से ही मशरूम के पैकेटों की आवक कम होने लगी है।

इस संकट का सीधा असर कैटरिंग, शादी-विवाह के आयोजनों और होटल व्यवसाय पर पड़ेगा, जहां मांग पूरी करने के लिए महंगे दामों पर मशरूम खरीदना पड़ेगा। इसके परिणामस्वरूप होटलों को अपने मेन्यू कार्ड की कीमतें बढ़ानी पड़ेंगी। जो मशरूम कभी आम मध्यमवर्गीय परिवार के लिए एक सस्ती, सुलभ और पौष्टिक सब्जी माना जाता था, वह अब अंतरराष्ट्रीय युद्ध और तनाव के कारण आम लोगों की थाली से दूर होने की कगार पर पहुंच गया है। किसानों का कहना है कि यदि सरकार की ओर से इस संकट के दौरान उर्वरकों पर कोई विशेष सब्सिडी या राहत नहीं दी गई, तो अमृतसर का यह फलता-फूलता उद्योग पूरी तरह बर्बाद हो सकता है।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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