Jharkhand News: झारखंड के गुमला जिले में इस समय भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप ने आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। मई के इस महीने में हर दिन पारा 39 से 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है, जिसके कारण जिले की जीवनदायिनी मानी जाने वाली नदियां, कुएं, तालाब और नाले पूरी तरह सूख चुके हैं। जलस्तर रसातल में चले जाने के कारण पूरे गुमला जिले में एक भयानक जल संकट गहरा गया है। इस भीषण पेयजल किल्लत का सबसे बुरा असर न सिर्फ शहरी और ग्रामीण आबादी पर पड़ा है, बल्कि बेजुबान पशु-पक्षी भी पानी के अभाव में दम तोड़ने को मजबूर हैं। सरकारी तंत्र की लापरवाही और अधूरी पड़ी नल-जल योजनाओं के कारण आज गुमला के करीब आठ प्रखंडों के लोग बूंद-बूंद पानी के लिए मीलों भटकने को मजबूर हैं।
आइए जानते हैं कि गुमला जिले के अलग-अलग इलाकों में पेयजल व्यवस्था की क्या हकीकत है और प्रशासन के दावों की पोल कैसे खुल रही है।
Jharkhand News: गुमला शहर में पानी की सप्लाई ठप, नगर परिषद की बड़ी लापरवाही
गुमला शहरी क्षेत्र की बात करें तो यहां नगर परिषद की भारी लापरवाही का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। शहर के कई महत्वपूर्ण मुहल्लों में पाइपलाइन तो बिछी हुई है, लेकिन सालों से उसमें पानी की एक बूंद भी नहीं आई है। हैरानी की बात यह है कि जिन इलाकों में आज से चार-पांच साल पहले तक नियमित पानी आता था, वहां भी अब सप्लाई पूरी तरह बंद कर दी गई है।
इस चिलचिलाती गर्मी में लोग अपनी प्यास बुझाने और घरेलू कामकाज के लिए इधर-उधर से पानी का जुगाड़ करने को मजबूर हैं। हालांकि, बढ़ते जन आक्रोश को देखते हुए नगर परिषद की अध्यक्ष शकुंतला उरांव और उपाध्यक्ष रमेश कुमार चीनी ने दावा किया है कि शहर में पानी का संकट नहीं होने दिया जाएगा और जरूरत पड़ने पर हर मुहल्ले में टैंकरों के जरिए पानी भेजा जाएगा। लेकिन जमीनी स्तर पर जनता को अब तक कोई बड़ी राहत नहीं मिली है।
सिसई और कामडारा: 90% जलमीनारें खराब, सरकारी मशीनें बनीं शोपीस
सिसई प्रखंड में पानी की स्थिति बेहद भयावह हो चुकी है। इस क्षेत्र में लगीं लगभग 90 प्रतिशत सरकारी जलमीनारें इस समय पूरी तरह से बंद और अनुपयोगी पड़ी हैं। जल जीवन मिशन के तहत पोड़हा गांव में करीब 200 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बन रही मेगा जलमीनार परियोजना पिछले चार सालों के बाद भी अधूरी लटकी है। वहीं प्रखंड मुख्यालय की मुख्य जलमीनार भी पानी के अभाव में दम तोड़ चुकी है। नदियों पर स्थायी चेकडैम न होने से पानी का भंडारण नहीं हो पा रहा है, जिसके कारण कर्मचारी अब बोरे का कच्चा बांध बनाकर जैसे-तैसे सप्लाई करने की कोशिश कर रहे हैं।
यही हाल कामडारा प्रखंड का भी है, जहां भीषण गर्मी में पेयजल संकट अपने चरम पर है। यहां की भी 90 प्रतिशत सोलर जलमीनारें तकनीकी खराबी के कारण बंद हैं। ‘हर घर नल योजना’ के तहत लोगों के घरों में नियमित पानी नहीं पहुंच रहा है। हद तो यह है कि प्रखंड मुख्यालय और अंचल कार्यालय परिसर में लगा आरओ फिल्टर मशीन महीनों से खराब है। दूर-दराज से आने वाले ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए सरकारी दफ्तरों के बाहर भटकना पड़ता है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं।
बिशुनपुर और डुमरी: कोयल नदी सूखी, अधूरी योजनाओं से मचा हाहाकार
बिशुनपुर प्रखंड की लाइफलाइन कही जाने वाली कोयल नदी इस समय पूरी तरह से सूखने की कगार पर पहुंच चुकी है। अन्य छोटे जलस्रोत अब केवल संकरे नाले में तब्दील हो गए हैं। पीएचईडी (PHED) विभाग की जलमीनार से छह महीने के लंबे इंतजार के बाद दो दिन पहले पानी की सप्लाई शुरू की गई थी, लेकिन मोटर खराब होने से वह फिर से ठप हो गई। जलापूर्ति कर्मी कमल महली का कहना है कि मरम्मत का काम चल रहा है और जल्द ही इसे ठीक कर लिया जाएगा, लेकिन फिलहाल बनारी समेत पूरे क्षेत्र के लोग कुओं और चापाकलों के भरोसे दिन काट रहे हैं।
दूसरी तरफ, डुमरी प्रखंड में करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाली पानी टंकी की योजना कछुआ गति के कारण अधूरी पड़ी है। नदियों और तालाबों के सूख जाने से महिलाओं और बच्चों को तेज धूप में पानी लाने के लिए मिलों दूर पैदल जाना पड़ रहा है। ग्रामीण लगातार प्रशासन से बंद पड़ी जलमीनारों को ठीक करने और अधूरी पड़ी जलापूर्ति योजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने की गुहार लगा रहे हैं।
घाघरा और पालकोट: पिंजरा नदी सूखी, पानी के लिए सुबह 4 बजे से लगती है लाइन
घाघरा प्रखंड में नल-जल योजना के तहत लाखों-करोड़ों खर्च करके बनाई गई जलमीनारों में से करीब 70 प्रतिशत खराब पड़ी हैं। कहीं का मोटर जल गया है तो कहीं की पाइपलाइन और सोलर प्लेट टूट चुकी है। रखरखाव के अभाव में ग्रामीण पानी के लिए तरस रहे हैं।
सबसे ज्यादा बदतर हालात पालकोट प्रखंड के हैं। यहां जलापूर्ति का एकमात्र सहारा मानी जाने वाली पिंजरा नदी पूरी तरह से सूख चुकी है। नदी सूखने से पालकोट दक्षिणी पंचायत के बस पड़ाव, सुभाष नगर और बंगाली टोली जैसी घनी बस्तियों में त्राहिमाम मचा हुआ है। पानी की किल्लत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय ग्रामीण अब सुबह के 4 बजे से ही जंगलों में स्थित प्राकृतिक निझर झरने पर जाकर लाइन लगाने को मजबूर हैं।
इसके अलावा, संजय गांधी चौक के दो सरकारी नलकूपों पर कुछ दबंगों ने कब्जा कर लिया है, जिससे आम लोगों को पानी नहीं मिल पा रहा है। दुखद बात यह भी है कि साल 2019 से काम कर रहे जलापूर्ति कर्मी रतिया साहू को पिछले दो साल से वेतन नहीं मिला है, जिससे वे खुद भुखमरी की कगार पर हैं, फिर भी जैसे-तैसे काम संभाल रहे हैं।
Jharkhand News: शंख नदी का जलस्तर गिरा, आसमान की ओर देख रहे लोग
जारी प्रखंड में स्थिति इतनी नाजुक है कि अब चापाकलों ने भी पूरी तरह से पानी देना बंद कर दिया है। जलस्तर काफी नीचे चले जाने से इस क्षेत्र की सभी जलमीनारें शोपीस बनकर रह गई हैं। अब ग्रामीणों के पास केवल एक ही रास्ता बचा है कि वे आसमान की तरफ देखें और राहत की बारिश का इंतजार करें।
वहीं, चैनपुर प्रखंड की जीवनदायिनी शंख नदी का पानी भी अब पाताल में चला गया है। डोरी नाला समेत अन्य सभी छोटे-बड़े जलस्रोत सूख चुके हैं। सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना का लाभ इस इलाके के लोगों को सपने जैसा लग रहा है, क्योंकि अधिकांश गांवों में अभी तक मुख्य पाइपलाइन भी नहीं बिछाई जा सकी है। अव्यवस्था के इस आलम में ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
प्रशासन को चाहिए कि वह कागजी दावों से बाहर निकलकर तुरंत इन सभी प्रखंडों में टैंकरों के जरिए पानी की आपातकालीन सप्लाई शुरू करे और बंद पड़ी जलमीनारों को युद्धस्तर पर ठीक करवाए, ताकि इस भीषण गर्मी में गुमला की जनता को थोड़ी राहत मिल सके।
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