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Cannes: कान्स फिल्म फेस्टिवल में चमकी झारखंड की ‘पेड़ चलता है’, पलामू के जंगलों की कहानी ने दुनिया को किया भावुक

Cannes: विश्व सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित मंच ‘कान्स फिल्म फेस्टिवल’ से भारत के लिए एक बेहद सुखद और गर्व करने वाली खबर सामने आई है। झारखंड की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म ‘पेड़ चलता है’ का कान्स के ‘मार्चे डू फिल्म’ (Marché du Film) सेक्शन में वर्ल्ड प्रीमियर किया गया। निर्देशक देबादित्य बंदोपाध्याय के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने अपनी सादगी और प्रकृति के साथ इंसान के गहरे जुड़ाव की कहानी से अंतरराष्ट्रीय दर्शकों का दिल जीत लिया है। यह फिल्म न केवल झारखंड की कला और संस्कृति को वैश्विक पहचान दिला रही है, बल्कि भारतीय इंडिपेंडेंट सिनेमा की ताकत को भी दुनिया के सामने मजबूती से रख रही है। प्रीमियर के बाद फिल्म के निर्देशक ने भावुक होते हुए इसे झारखंड की मिट्टी और वहां के संघर्षशील लोगों की जीत बताया है।

Cannes: झारखंड के पलामू की माटी से निकली एक वैश्विक कहानी

निर्देशक देबादित्य बंदोपाध्याय ने फिल्म के प्रीमियर के बाद मीडिया से बात करते हुए बताया कि ‘पेड़ चलता है’ की प्रेरणा उन्हें झारखंड के जंगलों और वहां की नदियों के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन से मिली। उन्होंने साझा किया कि इस फिल्म की कहानी पलामू के उन सुदूर इलाकों से शुरू हुई थी, जहां आज भी लोग प्रकृति को अपना परिवार मानते हैं। निर्देशक के अनुसार, पलामू के जंगलों की खामोशी, वहां की सूखी जमीन और तपती गर्मी ने फिल्म की पटकथा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि यह फिल्म केवल पर्यावरण पर आधारित कोई दस्तावेजी फिल्म नहीं है, बल्कि यह उन यादों और पहचान की तलाश है जो जंगल के साथ जुड़ी होती हैं। आज की आधुनिक जीवनशैली में जहां इंसान प्रकृति से कटता जा रहा है, यह फिल्म हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देती है।

पलामू के असली लोकेशंस पर हुई फिल्म की शूटिंग

Cannes
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फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका फिल्मांकन है। निर्देशक देबादित्य ने बताया कि उन्होंने फिल्म की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए किसी भी तरह के सेट या बनावटी ग्लैमर का सहारा नहीं लिया। पूरी फिल्म की शूटिंग झारखंड के पलामू संभाग के वास्तविक लोकेशंस पर की गई है। पलामू के जंगलों का प्राकृतिक वातावरण, वहां की प्राकृतिक आवाजें और बदलती रोशनी ने फिल्म के दृश्यों में जान फूंक दी है। शूटिंग के दौरान टीम को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन निर्देशक का मानना था कि झारखंड की मिट्टी की खुशबू और वहां की सच्चाई तभी पर्दे पर दिखेगी जब उसे वहीं के माहौल में फिल्माया जाए। फिल्म के हर दृश्य में दर्शकों को झारखंड की संस्कृति और वहां के लोगों का प्रकृति के प्रति निस्वार्थ प्रेम महसूस होगा।

प्रकृति और इंसान के रिश्तों की एक नई परिभाषा

‘पेड़ चलता है’ फिल्म उस गहरे दर्शन को दिखाती है कि जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं होते, बल्कि वे इंसानी अस्तित्व का आधार होते हैं। देबादित्य बंदोपाध्याय ने कहा कि जंगल लोगों की रोजी-रोटी, उनकी संस्कृति और उनकी पहचान का हिस्सा हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक पेड़ सिर्फ जमीन पर खड़ा नहीं रहता, बल्कि वह लोगों की भावनाओं के साथ ‘चलता’ और विकसित होता है। निर्देशक ने बहुत ही सरल तरीके से यह समझाने की कोशिश की है कि यदि प्रकृति सुरक्षित है, तभी मानवता का भविष्य सुरक्षित है। फिल्म की सादगी ही इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है, जिसे कान्स में मौजूद फिल्म समीक्षकों ने भी काफी सराहा है।

झारखंड और भारतीय सिनेमा के लिए गर्व का विषय

कान्स जैसे बड़े मंच पर झारखंड की किसी कहानी का पहुंचना वहां के स्थानीय कलाकारों और फिल्मकारों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। देबादित्य बंदोपाध्याय ने कहा कि एक फिल्ममेकर के तौर पर उनका हमेशा से यह सपना था कि वह अपनी जमीन की कहानियों को दुनिया के सामने रखें। ‘पेड़ चलता है’ का कान्स में प्रीमियर होना उनके व्यक्तिगत करियर की उपलब्धि से कहीं बढ़कर है। यह झारखंड की समृद्ध विरासत और वहां के फिल्म निर्माण की संभावनाओं पर वैश्विक मुहर है। उन्होंने इस सफलता का श्रेय अपनी पूरी टीम और झारखंड के उन लोगों को दिया, जिन्होंने इस कहानी को जीने में उनकी मदद की। निर्देशक का मानना है कि इस वैश्विक पहचान से भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक अवसर मिलेंगे और लोग ऐसी जमीनी कहानियों में दिलचस्पी दिखाएंगे।

Cannes: दर्शकों को झारखंड की सच्चाई महसूस कराना ही मुख्य उद्देश्य

फिल्म के निर्माण के पीछे के विजन को स्पष्ट करते हुए निर्देशक ने कहा कि वह चाहते थे कि अंतरराष्ट्रीय दर्शक स्क्रीन पर झारखंड की असलियत देख सकें। उन्होंने फिल्म में किसी भी प्रकार के ‘सिनेमैटिक लिबर्टी’ या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए दृश्यों से परहेज किया। उनका उद्देश्य था कि दर्शक जब फिल्म देखें, तो उन्हें लगे कि वे खुद पलामू के उन जंगलों में घूम रहे हैं और वहां के निवासियों के सुख-दुख को करीब से महसूस कर रहे हैं। कान्स में मिली सराहना इस बात का प्रमाण है कि ईमानदारी से कही गई कहानियां भाषा और सीमाओं के बंधन को तोड़कर सीधे दिल तक पहुंचती हैं।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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