Women Property Rights: भारत में आज भी करोड़ों महिलाएं अपनी संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े कानूनी अधिकारों से पूरी तरह अनजान हैं, जिसके कारण किसी शादीशुदा हिंदू महिला की बिना वसीयत मौत होने और पति या बच्चे न होने पर उसकी खुद की कमाई हुई संपत्ति मायके के बजाय सीधे ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों को सौंप दी जाती है।
Women Property Rights: बिना वसीयत के शादीशुदा महिला की मौत के बाद संपत्ति का हकदार कौन
हमारे समाज में आम तौर पर यही माना जाता है कि अगर किसी महिला का परिवार यानी उसका पति और बच्चे नहीं हैं, तो उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर पहला अधिकार उसके माता-पिता या भाई-बहनों का होना चाहिए। लेकिन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के कानूनी प्रावधान आम धारणा से बिल्कुल उलट हैं। अदालतों में आए दिन ऐसे दर्जनों मामले सामने आते हैं जहां महिला की खुद की गाढ़ी कमाई से खरीदी गई जमीन, मकान या बैंक बैलेंस उसके बूढ़े माता-पिता को मिलने के बजाय उसके देवर, जेठ या सास-ससुर के पास चला जाता है। कानून के इस पेचीदा नियम के बारे में सही जानकारी न होने की वजह से कई परिवारों को बाद में अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी महिला की संपत्ति का बंटवारा इस बात पर तय होता है कि वह प्रॉपर्टी उसने खुद खरीदी थी या उसे परिवार से विरासत में मिली थी। यदि किसी शादीशुदा हिंदू महिला की बिना वसीयत (Will) बनाए मृत्यु हो जाती है, तो उसकी खुद की कमाई हुई संपत्ति पर सबसे पहला अधिकार उसके पति और बच्चों का होता है। लेकिन यदि पति और बच्चे दोनों ही जीवित न हों, तो कानूनन वह संपत्ति महिला के माता-पिता को नहीं मिलती। उत्तराधिकार के नियम के अनुसार, वह सीधे महिला के पति के कानूनी वारिसों यानी ससुराल पक्ष के लोगों को ट्रांसफर हो जाती है। इस स्थिति में महिला का मायका पूरी तरह से अधिकार से बाहर हो जाता है।
संपत्ति के स्रोत के आधार पर कैसे बदल जाते हैं उत्तराधिकार के कानूनी नियम
माता-पिता से मिली विरासत का नियम
अगर महिला को वह संपत्ति उसके अपने माता-पिता से वसीयत या विरासत के रूप में मिली थी, तो इस स्थिति में कानून का रुख बिल्कुल बदल जाता है। यदि महिला के पति और बच्चे नहीं हैं, तो माता-पिता से मिली हुई प्रॉपर्टी वापस महिला के पिता के कानूनी वारिसों यानी उसके भाई-बहनों या मायके पक्ष के पास चली जाती है। इस विशेष परिस्थिति में ससुराल पक्ष का उस संपत्ति पर कोई कानूनी दावा नहीं बनता है।
पति या ससुर से प्राप्त संपत्ति का अधिकार
इसके विपरीत, यदि महिला को कोई संपत्ति उसके पति या उसके ससुर की तरफ से उपहार या विरासत में मिली थी, तो नियम फिर से बदल जाता है। ऐसी प्रॉपर्टी महिला के पति और बच्चे न होने की दशा में वापस पति के ही कानूनी वारिसों के पास लौट जाती है। यानी वह संपत्ति दोबारा उसी परिवार का हिस्सा बन जाती है जहां से वह आई थी।
पुरुष और महिला के उत्तराधिकार कानूनों में क्यों है इतना बड़ा अंतर
कानून में मौजूद इस व्यवस्था की क्यों हो रही है आलोचना
मौजूदा हिंदू कानून में पुरुषों और महिलाओं के लिए संपत्ति के अधिकारों में एक बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है, जिसे लेकर कानूनी हलकों में लगातार बहस चल रही है। जब किसी हिंदू पुरुष की मृत्यु बिना वसीयत बनाए होती है, तो उसकी मां को सबसे पहले अधिकार पाने वाले ‘क्लास वन’ वारिसों की श्रेणी में रखा जाता है। इसका मतलब है कि पुरुष की संपत्ति में उसकी मां का हिस्सा तुरंत तय हो जाता है।
लेकिन जब बात किसी महिला की संपत्ति की आती है, तो उसके खुद के माता-पिता को सबसे आखिरी पायदान पर जगह मिलती है। महिला के माता-पिता का नंबर ससुराल पक्ष के तमाम दूर के रिश्तेदारों के बाद आता है। कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि यह व्यवस्था उस दौर में बनी थी जब महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होती थीं, लेकिन आज के समय में जब महिलाएं खुद कमा रही हैं और अपने माता-पिता की जिम्मेदारी उठा रही हैं, तब यह नियम उनके मायके वालों के साथ एक तरह का भेदभाव प्रतीत होता है। यही वजह है कि यह गंभीर मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के सामने भी पहुंच चुका है।
Women Property Rights: महिलाओं के लिए क्यों जरूरी हो गया है समय पर वसीयत बनाना
कानून के इन्हीं उलझाव भरे नियमों के कारण अब कानूनी सलाहकार महिलाओं को अपने जीवनकाल में ही वसीयत (Will) बनाने की सख्त सलाह दे रहे हैं। खासकर उन महिलाओं के लिए वसीयत बनाना बेहद जरूरी है जो सिंगल हैं, विधवा हैं, तलाकशुदा हैं या जिनके बुजुर्ग माता-पिता आर्थिक रूप से पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर हैं।
अगर कोई महिला समय रहते अपनी लिखित वसीयत तैयार नहीं करती है, तो उसकी अचानक मृत्यु के बाद उसके बैंक खाते, बीमा राशि और म्यूचुअल फंड जैसे निवेश तुरंत फ्रीज हो जाते हैं। इन्हें वापस पाने के लिए मायके और ससुराल पक्ष के बीच लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो जाती है, जिसका खामियाजा बुजुर्ग माता-पिता को भुगतना पड़ता है। गहनों और पारिवारिक बिजनेस को लेकर होने वाले विवादों से बचने का एकमात्र रास्ता यही है कि हर महिला अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो और अपनी संपत्ति का भविष्य खुद तय करे।
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