नई दिल्ली | सरकारी अस्पताल में आने वाला आदमी ग्राहक नहीं, मरीज होता है। वह मोलभाव करने नहीं, जिंदगी बचाने आता है। उसकी जेब में इलाज के पैसे नहीं होते, इसलिए वह सरकार पर भरोसा करता है। लेकिन जब उसी व्यवस्था पर आरोप लगें कि दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और अस्पतालों की खरीद भी कमाई का जरिया बन गई, तो बीमारी शरीर में नहीं, व्यवस्था की आत्मा में उतर चुकी होती है।
दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में मेडिकल उपकरणों और दवाइयों की खरीद को लेकर सामने आया कथित घोटाला सिर्फ करोड़ों रुपये की कहानी नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है जिसके सहारे हर रोज़ लाखों गरीब मरीज सरकारी अस्पतालों की चौखट पार करते हैं।
क्या है मामला:
जांच एजेंसियों ने कई वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि बाजार मूल्य से कहीं अधिक कीमत पर सामान खरीदा गया। अदालत तय करेगी कि कौन दोषी है, लेकिन जनता के कुछ सवाल हैं जिनका जवाब व्यवस्था को देना होगा।
व्यवस्था से 5 सवाल:
- टेंडर समिति कहां थी: क्या एक अधिकारी की कलम से करोड़ों का खेल हो गया?
- वित्त विभाग सो रहा था: बिना बजट मंजूरी इतनी महंगी खरीद कैसे हुई?
- ऑडिट की आंख पर पट्टी: फाइलें सारे विभागों से गुजरीं, फिर भी गड़बड़ी नहीं दिखी?
- नियम इतने लचीले कैसे: करोड़ों रुपये बिना आवाज़ निकले तो नियम का क्या मतलब?
- जांच एजेंसी तक फाइल कैसे पहुंची: अगर प्रक्रिया पवित्र थी तो एजेंसियां क्यों आईं?
भ्रष्टाचार का मेडिकल साइंस:
यहां फाइल को बुखार नहीं आता, लेकिन उसे तेज़ी से चलाने के इंजेक्शन लगते हैं। हर टेबल पर दस्तखत होते हैं, हर जगह मुहर लगती है। जब घोटाला खुलता है तो सब कहते हैं – “हमने तो सिर्फ प्रक्रिया का पालन किया।” यही सरकारी संस्कृति है जहां जिम्मेदारी सबकी होती है, जवाबदेही किसी की नहीं।
असली कीमत कौन चुकाता है:
यह कीमत फाइल में दर्ज नहीं मिलेगी। वह उन मरीजों की लंबी कतारों में मिलेगी जो घंटों इंतजार करते हैं। उन परिवारों की आंखों में मिलेगी जो सरकारी अस्पताल को आखिरी उम्मीद मानकर आते हैं। और उस टैक्सपेयर की जेब में मिलेगी जिसे भरोसा दिलाया जाता है कि पैसा जनहित में लग रहा है।
गरीब आदमी अस्पताल में AC या चमचमाती बिल्डिंग देखने नहीं जाता। वह इसलिए जाता है कि प्राइवेट का बिल नहीं चुका सकता। उसके लिए सरकारी अस्पताल आखिरी उम्मीद है। अगर उसी उम्मीद के नाम पर खरीदी जाने वाली मशीनों-दवाइयों पर सवाल उठें, तो यह सिर्फ वित्तीय अनियमितता नहीं, नैतिक दिवालियापन है।
भारत विश्वगुरु भाषणों से नहीं बनेगा। वह तब बनेगा जब सबसे गरीब मरीज को भी भरोसा हो कि उसके नाम पर खर्च होने वाला एक-एक रुपया उसी की जिंदगी बचाने में लगेगा, किसी की तिजोरी भरने में नहीं।
स्वास्थ्य और शिक्षा ऐसे क्षेत्र हैं जहां मुनाफे की मानसिकता हावी हो जाए तो नुकसान सिर्फ आर्थिक नहीं रहता। वह सामाजिक और नैतिक संकट बन जाता है। हर बजट में स्वास्थ्य खर्च बढ़ता है, नई मशीनों की बात होती है। लेकिन अगर खरीद की मेज पर ही नीयत बीमार हो जाए तो सबसे आधुनिक मशीन भी जनता का विश्वास नहीं बचा सकती।
कानून अपना काम जरूर करे, लेकिन सवाल यह है – क्या व्यवस्था कभी अपना काम करेगी?


