Jantar Mantar History: देश की राजधानी दिल्ली की जमीन इन दिनों एक बार फिर विरोध-प्रदर्शनों और राजनीतिक हलचल के केंद्र में है। संसद मार्ग के पास स्थित ऐतिहासिक जंतर-मंतर अक्सर नीट पेपर लीक जैसे मुद्दों और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों के कारण सुर्खियों में छाया रहता है। धरने-प्रदर्शनों की वजह से इस जगह का नाम आए दिन देश की सुर्खियों का हिस्सा बनता है, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि यह केवल एक राजनीतिक अखाड़ा नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन वैज्ञानिक विरासत का एक बेहद अहम और अनमोल हिस्सा है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने केवल दिल्ली तक ही अपनी खगोलीय जिज्ञासा को सीमित नहीं रखा था, बल्कि देश के कुल पांच अलग-अलग शहरों में विशाल वेधशालाओं का निर्माण करवाया था। आखिर क्या है इन ऐतिहासिक स्थलों का इतिहास और आज के समय में उनकी क्या स्थिति है, आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
Jantar Mantar History: अठारहवीं सदी में रखी गई थी इन खगोलीय वेधशालाओं की नींव
यह वह दौर था जब आज की तरह अत्याधुनिक दूरबीनें, कंप्यूटर या अंतरिक्ष विज्ञान की आधुनिक तकनीकें सुलभ नहीं थीं। ऐसे समय में ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने, ग्रहों की चाल मापने, समय की सटीक गणना करने और सूर्य तथा चंद्रमा के ग्रहण का पूर्वानुमान लगाने के लिए एक अनूठे विज्ञान की जरूरत महसूस हुई। इसी उद्देश्य के साथ अठारहवीं शताब्दी के दौरान जयपुर के शासक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने ईंट और पत्थरों का उपयोग करके विशालकाय संरचनाओं का निर्माण करवाया। इन भव्य और अनूठे ढांचों को ही जंतर-मंतर के नाम से जाना गया। इन पांचों जगहों में दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा जैसे शहर शामिल थे, जहां इन खगोलीय यंत्रों को स्थापित किया गया था।
जयपुर का जंतर-मंतर: यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में दर्ज गौरव
इन पांचों वेधशालाओं में यदि किसी एक का नाम सबसे ऊपर आता है, तो वह राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर का जंतर-मंतर है। यह न सिर्फ इन सभी में आकार के लिहाज से सबसे विशाल है, बल्कि आज भी सबसे बेहतरीन और सुरक्षित हालत में बचा हुआ है। इसका निर्माण सत्रह सौ अट्ठारह से सत्रह सौ चौंतीस के बीच कराया गया था।
यहां स्थित सम्राट यंत्र को दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्य घड़ी के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसके इसी असाधारण वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए वर्ष दो हजार दस में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में अपनी सूची में शामिल किया। आज देश-विदेश से आने वाले पर्यटक और इतिहास प्रेमी इस अद्भुत रचना को देखने के लिए बड़ी संख्या में जयपुर पहुंचते हैं।
दिल्ली का जंतर-मंतर: देश की पहली खगोलीय धरोहर और आंदोलनों का केंद्र
संसद मार्ग पर शान से खड़ी यह ऐतिहासिक इमारत देश की सबसे पहली जंतर-मंतर वेधशाला मानी जाती है, जिसका निर्माण लगभग सत्रह सौ इक्कीस से सत्रह सौ चौबीस के दौरान हुआ था। राजा जय सिंह द्वारा बनवाई गई इस पहली वेधशाला ने विज्ञान के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की थी।
वक्त के पहिये ने करवट ली और आज वैज्ञानिक अध्ययन का यह केंद्र देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक आंदोलनों और धरना-प्रदर्शनों का प्रमुख गवाह बन चुका है। नीतिगत विरोधों से लेकर विभिन्न मांगों को लेकर होने वाली सभाओं तक, दिल्ली का यह परिसर हमेशा से लोगों की आवाज उठाने का एक बड़ा मंच रहा है।
Jantar Mantar History: उज्जैन और वाराणसी की वेधशालाएं: प्राचीन खगोल विज्ञान के जीवंत प्रतीक
मध्य प्रदेश का उज्जैन शहर प्राचीन काल से ही भारतीय खगोल विज्ञान का मुख्य केंद्र रहा है। यहां लगभग सत्रह सौ पच्चीस में जंतर-मंतर की स्थापना की गई थी। उज्जैन को भारतीय गणनाओं की प्रमुख मध्याह्न रेखा से भी जोड़ा जाता है, जहां स्थापित विभिन्न यंत्रों के जरिए आकाशीय पिंडों की स्थिति और समय का सटीक आकलन किया जाता था। उज्जैन रेलवे स्टेशन से आसानी से ऑटो या टैक्सी के जरिए इस स्थल तक पहुंचा जा सकता है।
दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में गंगा नदी के तट पर स्थित मान महल की छत पर मान सिंह आब्जर्वेटरी बनाई गई थी। इस ऐतिहासिक छत पर कई ऐसे खगोलीय यंत्र लगाए गए थे जो खगोलीय गणनाओं के काम आते थे। आज भी यह वेधशाला भारतीय वैज्ञानिक विरासत का एक महत्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती है और काशी आने वाले पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है।
Jantar Mantar History: वक्त की मार से नष्ट हो गया मथुरा का जंतर-मंतर
इन पांचों प्रमुख स्थानों में से चार आज भी किसी न किसी रूप में हमारे सामने मौजूद हैं, लेकिन एक ऐसा भी शहर है जहां की वेधशाला समय के थपेड़ों को सहन नहीं कर पाई। बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि उत्तर प्रदेश के मथुरा में भी महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने एक जंतर-मंतर बनवाया था।
दुर्भाग्यवश, उचित संरक्षण के अभाव और बदलते समय के साथ यह पूरी संरचना नष्ट हो गई। आज स्थिति यह है कि वहां इसके मूल खगोलीय यंत्रों का कोई भी अवशेष सुरक्षित नहीं बचा है। यही वजह है कि मथुरा का जंतर-मंतर अब केवल इतिहास के पन्नों और पुराने अभिलेखों में ही दर्ज होकर रह गया है।
संक्षेप में कहा जाए तो भारत की ये प्राचीन वेधशालाएं केवल ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पूर्वजों की उस वैज्ञानिक दूरदर्शिता की कहानी कहती हैं, जिन्होंने बिना किसी आधुनिक उपकरण के ब्रह्मांड की गहराइयों को नाप लिया था। आज भले ही इनमें से कुछ जगहें राजनीति और प्रदर्शनों का अखाड़ा बन चुकी हैं, तो कुछ यूनेस्को की सूची में शान से खड़ी हैं, लेकिन इनका ऐतिहासिक महत्व हमेशा अमिट रहेगा।
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